Month: December 2024

संघ

रत्नत्रय से युक्त एक मुनि भी संघ होता है क्योंकि रत्नत्रय में तीन हैं। संघ –> ऋषि (ऋद्विधारी), मुनि (अवधि/ मन:पर्यय/ केवलज्ञानी), यति (मूल/ उत्तर

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दु:ख में भगवान

यदि दु:ख में भगवान याद आते हैं तो इसमें अचरज क्या ! चकोर को भी चंद्रमा अंधेरी रात में ही अच्छा लगता है। स्वाध्याय सान्निध्य

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निधत्ति / निकाचित

एक मत के अनुसार कर्मों के निधत्ति और निकाचित गुण देवदर्शन से समाप्त हो जाते हैं; दूसरे मत के अनुसार आठवें गुणस्थान में। वस्तुत: यह

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ध्यानस्थ

ध्यानस्थ… भौंरे को फूल पर गुनगुनाते समय पराग का स्वाद नहीं आता। जब स्वाद लेता है तब गुनगुनाता नहीं। ब्र. प्रदीप पियूष हम भी गृहस्थी

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केवली में धातुऐं

केवली में धातुएँ स्थिर होती हैं। इसलिए शरीर के लिए कुछ करना* नहीं होता है। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थसूत्र 6/13) * कवलाहार।

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भाग्य / पुरुषार्थ

काँटा लग‌ना पूर्व के कर्मों से (तथा वर्तमान की लापरवाही से)। लेकिन रोना/ न रोना पुरुषार्थ का विषय। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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दंड

मन, वचन, काय की दुष्प्रवृत्ति को दंड कहते हैं। इसी से तीन भेद कहे गये हैं। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (शंका समाधान – 46)

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राग-द्वेष

हर केंद्र की परिधि होती है। और हमारी ? परिधि वृत्ताकार होती है, किन्तु हम डर कर या रागवश एक दिशा के क्षेत्र को सिकोड़

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निजपद

निजपद दीजै मोहि….. 1. निजपद = भगवान का पद। 2. निजपद = निज (स्वयं) + पद (पैर) = अपने पैरों पर खड़ा होना/ स्वावलम्बी होना।

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साधना

गृहस्थ जीवन जीते हुए साधना कैसे करें ? तुलाराम व्यापारी सामान तौलते समय दृष्टि तराजू पर रखता था। जब तराजू समानांतर हो जाती थी तब

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मंगल आशीष

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