Month: February 2025

भाव

मारीच के जीव के पास द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव उत्कृष्ट थे। पर 5वाँ निमित्त भाव, जघन्य था। यह भाव इतना शक्तिशाली होता है कि वह

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अनुकम्पा

दो प्रकार की अनुकम्पा –> सामान्यजन के प्रति अनुकम्पा। साधुजन के प्रति अनुकम्पा। इसमें विशेष पुण्य/ लाभ मिलेगा। Feeling विशेष होगी क्योंकि Object Higher Quality

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मोह

मोह ऐसा है जैसे मरुस्थल में सावन तो आया (दिखता/ लगता) पर पतझड़ न गया (आत्मा से मोह)। इनके पेड़ों पर सुख/ शांति के फल

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देव आयुबंध

आत्मा से साधे (सरागसंयमी, संयमासंयम) –> विशिष्ट पर्याय वैमानिक देव, अगली पर्याय में भी संस्कार लेकर जाते हैं। मन से साधे –> अकाम निर्जरा, पुण्यार्जन।

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पथिक

बिना प्रमाद, श्वसन क्रिया सम, पथ में चलो। आचार्य श्री विद्यासागर सागर जी

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अवधिज्ञान

अवधिज्ञान, धर्म/ शुक्ल ध्यानों में सहायक हो सकता है जैसे लोकाकाश का स्वरूप देखकर/ सीमंधर स्वामी का समवसरण देख कर धर्म/ शुक्ल ध्यानों में सहायक

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परिहार-विशुद्धि

परिहार-विशुद्धि संयम पाने की योग्यता 30 वर्ष (भरत ऐरावत क्षेत्र में, विदेह क्षेत्र में 8 वर्ष) (कारण ?) ध्यान करने योग्य योग्यता आ जाती है,

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सुख

सबसे कम शब्दों/ समय में सुख की परिभाषा बता दें। गुरु मौन हो गये। थोड़ी देर बैठ कर जिज्ञासु चला गया। अगले दिन आभार प्रकट

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तप

अकर्तृत्व के त्याग रूप चारित्र* में जो उद्योग और उपयोग** होता है/ छल कपट त्याग होता है, उसे तप कहते हैं।…(पृष्ठ.101) * आलोचना व प्रतिक्रमण

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साधु / गृहस्थ

साधु की Dress एक, Address अनेक। गृहस्थ की Dress अनेक, Address एक। मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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मंगल आशीष

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