Month: February 2026
ज्ञान
सामान्यजन का ज्ञान प्राय: धारावाहिक/ पुनरावृत्ति वाला होता है। यही सही है (चाहे झूठ ही क्यों न हो) मिथ्याज्ञान है, क्योंकि संयोगपने से पैदा होता
शरीर / आत्मा
आत्मा शरीर के माध्यम से भोग करती है। तभी तो शरीर पर चींटी, अनुभव आत्मा करती है। आत्मा निकलने के बाद बिच्छू भी काट ले
चेतना
कर्म-फल चेतना का अनुभव… कि मैं हूँ। फल भोगना सुख-दु:ख की अनुभूति तो सब जीवों में होती है, कीड़ों में भी। कर्म-चेतना (कर्ता भाव) संज्ञियों
अहिंसा / अनुकम्पा
अहिंसा मुनियों के लिये क्योंकि उनके पास अनुकम्पा करने के साधन नहीं होते हैं। अनुकम्पा तो गृहस्थों के लिये होती है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर
धर्मात्मा
धर्म शुरु में कांटों* से बचने को कहता है। आगे चलकर फूलों** से भी। चिंतन
गुरु
गुरु कोई व्यक्ति नहीं शक्ति हैं। जो हमको कभी नज़रों से, कभी आशीर्वाद से और कभी भावनाओं से बिना कहे/ बिना कुछ करे शक्ति देते
आहार
1991 के मुक्तागिरि के चातुर्मास में आचार्य श्री विद्यासागर जी ने मुनियों को सम्बोधन दिया… दुर्भाग्य है कि पंचमकाल में आहार के लिये रोज़ उठना
अनेकांत
जितना कीमती हीरा, उतने ज्यादा कोण। ऐसे ही जिस व्यक्ति के जितने ज़्यादा दृष्टिकोण, वह व्यक्ति उतना ही ज़्यादा महान। निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी
ज्ञान
कम से कम ज्ञान निगोदिया को। जिसे “नित्य उद्घाटित ज्ञान” कहते हैं। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – अध्याय 8)
जीना
जीना और जाना तो निश्चित है। कैसे जाना/ क्या करके जाना ताकि आगे का जीवन अच्छे से जी सकें, यह हमारे हाथ में है। चिनाई
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