जब तक हमारे विचारों में शुद्धि, सामर्थ्य तथा एकता न हो,
शरीर के कोशिकाओं की तंदुरुस्ती, सामर्थ्य तथा एकता को बनाए रखना असम्भव है।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
अपनी समर्थता से सधर्मी की असमर्थता को समर्थता में बदलना ।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
निंदा के साथ पूजा करना, स्वनिंदा बिना पूजा से कम महत्वपूर्ण है। स्वनिंदा से कर्मों का नाश होता है।
कहा जाता है –> परनिंदा करने वाले परिंदे बनते हैं।
आर्यिका अर्हम्श्री माताजी
दो जुड़वां भाइयों के सब कुछ एक सा होते हुए भी,भाग्य अलग-अलग क्यों?
क्योंकि पूर्व संचित कर्म अलग-अलग होते हैं, जिन्हें कोई जानता नहीं।
फिर हम प्रतिस्पर्धा किस आधार पर कर सकते हैं !
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 18 मई)
पहले तात्कालिक लाभ को प्राथमिकता पर दीर्घकालीन ज्यादा महत्वपूर्ण।
मंदिर आदि में (बोलियाँ आदि लेना) चार प्रकार के दानों के अलावा, धर्म प्रभावना के लिए “धर्मदान” में आयेगा।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (जिज्ञासा समाधान – 4-4-22)
धर्म जीने की कला सिखाता है, साथ साथ मरने का सलीका भी।
जैसे एक ही थाली से खाया भी जाता है, त्याग भी।
आर्यिका अर्हम् श्री माताजी
जब तन साथ नहीं जाता तो सन (Son) कैसे जायेगा !
पति नहीं जायेगा पर पाप ज़रूर साथ जायेगा।
चिंतन
अस्वस्थ होते हुए भी हम स्वस्थ हैं, ऐसी धारणा बनाने से समता आयेगी।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
दान देने में भी आनंद तभी आता है जब आप स्वाधीन हों,
जैसे भिखारी को खिलाते समय कोई प्रतिक्रिया की अपेक्षा नहीं सो खिलाने में आनंद आता है, मेहमान आदि को खिलाते समय हमारी खुशी प्रतिक्रिया के अधीन होती है।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 6 जुलाई)
जैसे जैसे पैसा बढ़ता जाता है शून्यता बढ़ती जाती है –> 10, 100, 1000….।
इसलिये बुजुर्गों ने 11, 101, 1001, देने का रिवाज बनाता था। ताकि रिश्तों में एक-ता बढ़े, शून्यता नहीं।
धर्मेन्द्र (चिंतन)
संसार की एक उपयोगिता यह भी है कि यहाँ सुख का Taste/ पहचान हो जाती है (सुखाभास के रूप में)। तभी तो असली/ Permanent/ अनन्त सुख की अभिलाषा जाग्रत हो जाती है/ चेष्टा करने का मन होने लगता है।
चिंतन
कर्तृत्व, भोक्तृत्व तथा स्वामित्व भावों से बुद्धि भ्रष्ट होती है।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
Lack of confidence के कारण ?
हो पायेगा (भविष्य का भय) !
या
हो गया था (भूत के दुखद अनुभव)
यही हमारी गाथा है, आत्मविश्वास का खाका है।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 17 मई)
धैर्य, क्षमतानुसार पुरुषार्थ करके बिना विकल्प के फल का इंतज़ार करना।
क्षमतानुसार पुरुषार्थ न करके फल का इंतज़ार करना, आलस होता है।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
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