संसार में रहो, पर रमण करो अपने में ।

मुनि श्री प्रमाण सागर जी

कमल कीचड़ में पैदा होता है, कीचड़ में बढ़ता है, पर कीचड़ से निर्लिप्त रहता है ।
हम लोग भी संसार में पैदा होते हैं, संसार में ही बड़े होते हैं पर सिर्फ ज्ञानी लोग ही संसार से निर्लिप्त रहपाते हैं ।

महात्मा गौतम बुद्ध

देशप्रेम के भाव न रखने से कर्मबंध क्यों ?

जैसे माता-पिता, धर्म, गुरू का आप पर उपकार है, ऐसे ही देश का भी है ।
यदि उपकार के बदले अपकार करेंगे तो कर्मबंध तो होगा ही ।

चिंतन

It is from one human being to another :

When I’ll be dead, your tears will flow, but I won’t know, cry for me now instead.
you will send flowers, but I won’t see ,send them now instead.
you will say words of praise, but I won’t hear, praise me now instead.
you will forget my faults, but I won’t know, forget them now instead.
you will miss me then, but I won’t feel, miss me now instead.
When I’ll be dead, you will wish you had spent more time with me, spend it now instead.

Spend time with every person you love, every one you care for !
Make them feel special for you, never know when time will take them away from you forever !!

(Mr. Sanjay)

बच्चों को मैच पर निबंध लिखने को मिला ।
आलसी बच्चा एक लाईन लिखकर आया -“बारिश की वज़ह से मैच रद्द हो गया ।”

हम भी अपने कर्तव्यों/धर्म से बचने के ऐसे ही बहाने/Short cuts तो नहीं ढ़ूंढ़ते रहते !!

मुनि श्री तरुणसागर जी

सही दिशाबोध होने पर मंज़िल अवश्य मिलती है ,
क्योंकि सही दिशा का प्रसाद ही, सही दशा का प्रसाद है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

यात्री ने कंड़क्टर से एक टिकट मांगते हुये, एक हजार का नोट दिया ।
कंड़क्टर – कहाँ का टिकट चाहिए ?
यात्री – तुमको हजार रूपये दिये ना !! बस एक टिकिट दे दो ज्यादा पूछताछ करने की ज़रूरत नहीं है ।

हम भी ऐसे ही पैसा/समय बर्बाद कर रहे हैं पर हमको मंज़िल का पता नहीं है ।
यदि कोई पूछता भी है तो हमें झुंझलाहट आती है, यह प्रश्न ही निरर्थक लगता है ।

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