चारों कषायें इंटरचेंजेबल हैं। मान की पूर्ति नहीं होती तो क्रोध आ जाता है, क्रोध से सफलता नहीं मिलती तो मायाचारी करने का लोभ आता है।
कषायों को संभालना वैसे ही है जैसे मेंढकों को तराजू पर तौलना।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – अगस्त 31)

बनता*
चुपचाप है,
टूटता
आवाज़ के साथ है।
इस संसार में
आवाज़ ही
आवाज़ है।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

* निर्माण।

मनुष्यों की श्रेणियाँ…

  • कंजूस – मेरा 1 रुपया खर्च न हो, दूसरे के चाहे हज़ारों।
  • संतुलित – मैं भी खर्च करूँ, दूसरे को भी करने दूँ।
  • असंतुलित – मैं ही खर्च करूँ, दूसरे को खर्च न करने दूँ।

चिंतन

जैन साधु की पहचान, पदयात्री तथा करपात्री।

  • पदयात्री – जीवनपर्यन्त पैदल चलते हैं।
  • करपात्री – जीवनपर्यन्त हाथ में भोजन करना/ बर्तनों में नहीं।

मुनि श्री अजितसागर जी

नारियल को “श्रीफल” इसके अनेक गुणों के कारण कहते हैं। अन्य फलों से इसमें एक और विशेषता होती है कि यह रस अलग से बनाता है।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

उपधि = परिग्रह।
उपाधि = बौद्धिक बीमारी, मेंटल नहीं। बुद्धि को मेन्टेन नहीं कर पा रहा, इसीलिए तो उपाधि चाहिए।
इन दोनों से जब व्यक्ति रहित हो जाता है तब समाधि कर पाता है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 16 अक्टूबर)

आचार्य श्री विद्यासागर जी कहा करते थे…
यदि अपनी आत्मा के दर्शन/ अनुभूति नहीं कर पा रहे तो दूसरों में आत्मा के दर्शन/ देखना शुरू कर दो।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 4 अक्टूबर)

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