मन
आचार्य श्री विद्यासागर जी सुनाते थे…
क्या हो गया समझ में, मुझको न आता,
क्यों बार-बार मन बाहर दौड़ जाता।
स्वाध्याय ध्यान करके मन रोध पाता,
पै श्वान सा मन सदा मल शोध लाता।
आचार्य श्री समयसागर जी
आचार्य श्री विद्यासागर जी सुनाते थे…
क्या हो गया समझ में, मुझको न आता,
क्यों बार-बार मन बाहर दौड़ जाता।
स्वाध्याय ध्यान करके मन रोध पाता,
पै श्वान सा मन सदा मल शोध लाता।
आचार्य श्री समयसागर जी
4 Responses
मन का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए भन को नियंत्रण रखना परम आवश्यक है।
Yahan par ‘रोध पाता’ ka meaning clarify karenge, please ?
रोकना।
Okay.