Month: July 2026
रागद्वेष
(शुद्ध) आत्मा में तो रागद्वेष होता ही नहीं है। कर्म (वर्गणा) में भी नहीं, वे तो Neutral होती हैं, रागद्वेष उनमें हम भरते हैं। चिंतन
भगवान / गुरु
बच्चों को भगवान की “जय” कहलवाओ तो वह कह देता है “दै”। उसकी भाषा माँ ही समझ पाती है। भगवान की भाषा गुरु ही समझते
सम्यग्दर्शन
चरणानुयोग के अनुसार सम्यग्दृष्टि का संसार लगभग अनन्त। करुणानुयोग के अनुसार संसार बहुत थोड़ा सा, क्योंकि वह छटपटाता है। संसार कैसे भी छूटे ! निर्यापक
ज्ञान / क्रिया
ज्ञान / क्रिया… श्री आर.के.जैन (कलेक्टर) से पूछा –> आपके पास सबसे ज्यादा शिकायत कौन सी आती हैं ? पत्रकार.. “आप लोगों को समाज की
कर्म-फल
पुलिस जब सज़ा देती है तो दिखाई देती है तथा उनका डंडा भी, वेदना तो होती ही है। देवता दिखते नहीं सिर्फ डंडा दिखता है,
सम्बंध
मिट्टी सुंदर, पानी भी सुंदर, आपस में सम्बंध स्थापित करते ही असुंदर कीचड़। आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी (जब दो सुंदर वस्तुओं के संबंध का आउटपुट
जीव
जीव उपयोग लक्षण वाला, अंत रहित (अनादि-अनंत), अपने कर्म का करने वाला अर्थात कर्ता और भोगने वाला है। समणसुत्तं – गाथा 592
धार्मिक / धर्मात्मा
धार्मिक –> जो धार्मिक क्रियायें करे। धर्मात्मा –> जिसकी आत्मा में धर्म आ गया हो/ धर्म को आत्मसात कर लिया हो। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर
तप
श्रावक का तप –> अभक्ष्य त्याग से तप शुरू। रात्रिभोजन त्यागादि से तप बढ़ता चला जाता है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
कोटा
कोटा पद्धत्ति तो Tension ही देती है। चाहे सरकारी नौकरियों में हो या धार्मिक क्रियाओं का (कोटा फिक्स करके धर्म करना)। चिंतन
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