Month: June 2026
गोत्र
राजा श्रेणिक के नरक आयुबंध के समय नीच-गोत्र बंध हो रहा था। मरण के समय उच्च-गोत्र बंध क्योंकि वे चौथे गुणस्थान में थे। नरक गये
मौन
शब्द तो यदा-कदा चुभते ही रहते हैं सबके, जब … मौन चुभ जाए किसी का तो सम्भल जाना चाहिए । (मंजू रानीवाला)
दिव्यध्वनि
दिव्यध्वनि से ज्ञान तो मिलता ही है। इससे आहारदान भी क्योंकि भूख नहीं लगती। औषधि दान भी, क्योंकि बीमारी नहीं आती। अभयदान, क्योंकि वहाँ डर
भाव कर्म आदि
सिर्फ़ भाव-कर्म/पूजा/मुनि आदि का महत्त्व नहीं। भाव सहित कर्म/पूजा/मुनि का महत्त्व होता है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
जीव विपाकी
जीव विपाकी… सूक्ष्म/ बादर –> जीव की परिणति है। आदेय –> यशस्वी, कीर्तिवान्, लोकमान्य। तीर्थंकर प्रकृति –> महसूस करते हैं, अहंकार नहीं करते। मुनि श्री
पाप
पाप भी दो रूप –> विनाश रूप। विकास रूप/ समाज की मान्यता प्राप्त। जैसे कानून के तहत फाँसी, सूकर शेर को मारकर ५वें स्वर्ग गया,
अर्थी
अर्थी उठने पर ही, (जीवन का) अर्थ (निस्सारता) समझ आता है। जिसकी अर्थी उठी, वह तो समझ नहीं पाया/ पायेगा, उठाने वाले तो समझें !
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