Month: June 2026
आनुपूर्वी
आनुपूर्वी… सिर्फ विग्रहगति में उदय (पूर्व आकार बनाये रखना) जैसे नरकगत्यानुपूर्वी –> नरक की ओर गति कराना। इस दौरान तीनों का उदय रहता है (नरकगत्यानुपूर्वी,
दुस्वर
ज्ञानी के भी दुस्वर कर्मोदय के समय, उनकी हितकारी बात भी सुनना नहीं चाहते। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 8/11 )
तृष्णा
संसार की तृष्णा को लता कहा है, क्योंकि लता तेजी से बढ़ती है, ज़रा सा निमित्त मिल जाए तो बहुत तेजी से। चिंतन
निकांक्षित अंग
अनैतिक उपलब्धियों/ भोगविलास की इच्छा करना ही निकांक्षित-अंग में दोष है। सामान्य/ सांसारिक इच्छा रखने में दोष नहीं। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
संगति
संगति… हजारों किलो कपास अकेले होने पर, पलभर में पूरा जल जाता है; थोड़ा सा कपास घी की संगति में (बत्ती बन) घण्टों तक रोशनी
रस / नामकर्म
वनस्पतिकायिक जीवों के शरीर से खट्टे, मीठे, कषायले, कड़वे, तीखे रस आते हैं। त्रस जीवों के शरीर में भी इन जीवों का रस रहता है।
आध्यात्मिकता
जरूरतों को कम, इच्छाओं को दुर्बल करना आध्यात्मिकता है। मुनि श्री प्रमाणसागर जी
शरीर / आत्मा
एकेन्द्रिय जीवों से हमारे शरीर की रक्षा/ पालन होता है। विकलेन्द्रियों तथा सकलेन्द्रिय तिर्यंचों के प्रति दया/ रक्षा के भावों से आत्मा की रक्षा। चिंतन
सेवा
सेवा प्रशंसनीय है, यदि उसमें ममत्व* न हो। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी * धन, प्रतिष्ठा आदि से भी न हो।
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