साधु देखते हुए और भी बहुत कुछ देखते हैं,
सुनते हुये और भी बहुत कुछ सुनते हैं जैसे किसी ने “मूर्ख” कहा तो वे ‘म’ ‘ऊ’ ‘र’ ‘ख’ सुनते हैं, इन अक्षरों से न राग होगा न द्वेष।
मुनि श्री सुधासागर जी
अदृश्य वायरस यदि आपको डरा सकता है,
तो अदृश्य भगवान पर श्रद्धा आपको बचा भी सकती है।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
मानव गगन चुंबी अट्टालिकायें तो बना सकता है पर सूर्य के प्रकाश को पूरी तरह रोक नहीं सकता, वह ऊपर से प्रकाशित कर जायेगा।
हाँ ! पूर्ण लाभ लेना हो तो प्रकृति के पास जाना होगा – खुले मैदान, पहाड़, नदी/समुद्र किनारे या जंगलों में, सीमेंट के जंगलों में तो अवरोधित प्रकाश ही मिलेगा।
चिंतन
बाज़ार जाओ तो सेवक बन कर लिस्ट के अनुसार खरीददारी करो, मालिक बनकर गये तो चीजें आकर्षित करेंगी।
जैसे कैमिस्ट की दुकान पर पर्चे के अनुसार दवाई लेते हो न !
स्वादिष्ट/कीमती दवा तो नहीं लेते हो !!
मुनि श्री सुधासागर जी
चंदन के वृक्ष तो बहुत कम हैं/ कम ही बन सकते हैं।
नीम के बन जाओ, औषधि युक्त।
वह भी न बन सको तो जंगली पेड़ ही बन जाना, शीतलता दोगे/भूखे के भोजन बनाने में सहायक होगे।
पर कांटेदार झाड़ी कभी मत बनना।
घटना घटना होती है, उसका सुख-दु:ख से सम्बंध नहीं होता है ।
वरना बड़े बड़े ऑपरेशन हो ही नहीं सकते थे ।
ऐनसथिसिया देकर दर्द के दु:ख को चेतना/दिमाग/मन से अलग करके बिना दर्द/दु:ख के ऑपरेशन कर दिये जाते हैं ।
हम अन्य घटनाओं से मन/दिमाग हटा लें तो दु:ख भी नहीं होगा ।
आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी
किसी के पीछे ज्यादा नहीं पड़ना चाहिये –
इसका एक भव सुधारने के लिये अपने भव-भवांतर क्यों बिगाड़ना चाहते हो !
झगड़ा न करें पर Compromise भी ना करें।
मुनि श्री सुधासागर जी
सबसे बड़ा कृपण वह है जो कृपा न माने।
चिंतन
दूध, दही, मक्खन व घी का जन्म एक ही कुल में, पर कीमत अलग अलग।
कारण ?
श्रेष्ठता कुल में पैदा होने से नहीं बल्कि सद्कर्मों/स्थिरता तथा तपने से आती है।
(सुरेश)
पूजा गुणानुवाद है, भक्ति गुणानुराग – भगवान/गुरु व उनके गुणों से।
भक्ति श्रद्धा का बाह्य रूप है पर इससे आंतरिक प्रेम उत्पन्न करता है।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
जो कर्मसिद्धांत पर विश्वास करते हैं, उन्हें पुनर्जन्म पर विश्वास करना ही होगा।
वरना इस जन्म के अंत समयों में किये गये कर्मों का फल कब और किस जन्म में भोगोगे ?
चिंतन
पनही* पशु के होत हैं, नर के कछू नहीं होत।
नर यदि नर-करनी करे, तब नारायन होत।
*जूता (पशु की खाल का)
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
दो तरह से चीजें देखने में छोटी नज़र आतीं हैं –
1. दूर से
2. ग़रूर से
(अनुपम चौधरी)
जुगुनू तब तक ही चमकता रहता है जब तक वह उड़ता रहता है/सक्रिय रहता है।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
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