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अहंकार सत्य को स्वीकार नहीं करता है,
और
सत्य को जानने वाला कभी अहंकार नहीं करता है।
जय जिनेंद्र
????????(अनुपम चौधरी)????????
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ख़ामोशी/ स्थिरता का भी अपना ही मज़ा है,
पेड़ों की जड़ें कभी फड़फड़ाया नहीं करतीं…
पत्ते फड़फड़ाते हैं तो सूख कर या टूट कर गिर ही जाते हैं।
????(मंजू)????
अपने से ज्यादा ज्ञानी के सामने बोलना मत वरना ज्ञान लेने में अवरोध आ जायेगा ।
अपने से कम ज्ञानी के सामने बोलना मत वरना Irritation हो जायेगा ।
चिंतन
हाथ में ज्यादा पत्ते होने से खिसकने की संभावना ज्यादा हो जाती है (उतना ही रखो जितना सम्भाल सकते हो) ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
सुख अपनों में ही नहीं, बाहर वालों में भी ।
दूसरों को सुखी बनाने का सुख, अपने सुख से ज्यादा होता है ।
पूर्ण सुख – कुछ घर का, कुछ बाहर का ।
अपने में से दूसरों को कितना दिया ?
कमाई बिना टैक्स दिये जेल की सज़ा ।
बिना दान – दुर्गति ।
मुनि श्री सुधासागर जी
धरती/आसमान मिलते दिखाई देते हैं, पर हैं नहीं ।
आत्मा/शरीर भी एक रूप दिखते हैं, पर हैं नहीं ।
अज्ञानी इस भ्रम में शरीर को ही सब कुछ मानकर उसकी सब मांगों से भी ज्यादा देता है, उसे बिगाड़ देता है जैसे लाड़-प्यार में बच्चों को बिगाड़ देते हैं ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
शरीर भोजन से ही नहीं वातावरण से भी ग्रहण करके स्वस्थ रहता है ।
बचपन में ग्रहण ज्यादा, खर्च कम ।
उम्र के साथ ग्रहण कम होता जाता है, खर्च ज्यादा ।
चिंता/तनाव से खर्चा तेज होता जाता है ।
मुनि श्री सुधासागर जी
Champion वही बनता है जिसकी दृष्टि अर्जुन की तरह Goal/चिड़िया की आँख पर रहती है ।
दृष्टि को जितना केन्द्र से दूर ले जाओगे उतना ही अपने Goal से दूर होते जाओगे ।
चिंतन
ज्यादा पौष्टिक भोजन मन को विकारी बनाता है तथा तन को बीमार करता है।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

(डॉ. संजय जैन)
गंधी चारों और सुगंध फैलाता है जैसे हंस सरोवर की शोभा,
गंदी गंदगी जैसे सरोवर में सूअर कीचड़-कीचड़ कर देता है।
एक-एक गुण का आदान/प्रदान दोनों पक्षों के पास दो-दो गुण पहुँचा देता है, ऐसे ही बुराई ।
बुरे का साथ निभाना ही पड़ जाए तो Distancing ही उपाय है।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
“निंदक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवायै”
सार्वजनिक क्षेत्र में आंगन रामलीला मैदान होता है ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
चील ऊंचाई पर उड़ती है, बिना पंख मारे देर तक उड़ती रहती है, उनके बच्चे भी ऊंचाई पर सुरक्षित – पुराने पुण्य से ।
छोटी छोटी चिड़ियोँ के पास उतने पुण्य नहीं, सो बार-बार पंख मारने पड़ते हैं फिर भी ऊँचाईयों को नहीं छू पातीं ।
चिंतन
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