फल एक बार ही स्वाद (खट्टा या मीठा) देता है,
कर्म भी एक बार फल देकर झर जाते हैं ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

तपादि के कष्ट वैसे ही हैं जैसे फोड़े को ठीक करने के लिये डाक्टर फोड़े को फोड़ता है/कष्ट होता है ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

दर्पण साबुत होता है तब सब उसे देख-देख कर चलते हैं,
टूट जाता है तो उससे ही बच-बच कर चलते हैं ।

दर्पण यदि आचरण के फ्रेम में जड़ जाय तो टूटने का डर ही नहीं रहेगा ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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