पुरुषार्थ से लेखन, जो आगे चल कर भाग्य बन जाता है ।
पर फ़िर पुरुषार्थ से उसे मिटाकर ठीक भी कर सकते हैं ।
व्यक्ति को कहाँ सक्रिय रहना चाहिए और कहाँ निष्क्रिय ?
सक्रिय – जहाँ पर स्व-पर का हित हो,
अन्य जगहों पर निष्क्रिय ।
क्षमा कैसे करें ?
बस क्षमा करके/बैर छोड़कर, उनसे भी जिनको पता ही नहीं कि तुम उनसे बैर करते हो ।
मुनि श्री अविचलसागर जी
धन पाप/पुण्य रूप नहीं होता ।
पाप/पुण्य में उसका उपयोग, उसे पाप/पुण्य रूप बनाता है ।
मन भेद में कषाय (क्रोध, मानादि) है,
मत भेद में नहीं ।
मुनि श्री सुधासागर जी
जीना है तो जीना चढ़ जाओ,
वरना जीना छोड़ दो ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी

(सुरेश)
उस छवि की ही चिंता की जाती है, जिसकी छाया पड़ती है, जैसे मकान, कार, शरीर आदि ।
आत्मा की छाया पड़़ती नहीं , सो हम उसकी चिंता करते नहीं !
चिंतन
फल एक बार ही स्वाद (खट्टा या मीठा) देता है,
कर्म भी एक बार फल देकर झर जाते हैं ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
तपादि के कष्ट वैसे ही हैं जैसे फोड़े को ठीक करने के लिये डाक्टर फोड़े को फोड़ता है/कष्ट होता है ।
गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी
धर्म….
पाप काटने के लिये नहीं,
पाप से बचने के लिये करना चाहिए ।
दर्पण साबुत होता है तब सब उसे देख-देख कर चलते हैं,
टूट जाता है तो उससे ही बच-बच कर चलते हैं ।
दर्पण यदि आचरण के फ्रेम में जड़ जाय तो टूटने का डर ही नहीं रहेगा ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
थोड़ी वर्षा कीचड़ करती है, पूरी वर्षा सफ़़ाई ।
मुनि श्री अविचलसागर जी
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