????????????????????????????????????????????????????
“दर्द” एक संकेत है कि…
*आप जिंदा हो*,

“समस्या” एक संकेत है कि….
*आप मजबूत हो,*

“प्रार्थना” एक संकेत है कि…..
*आप अकेले नहीं हो*
????????????????????????????????????????????????????

(अनुपम चौधरी)

धन और समय का ही दान नहीं होता बल्कि पांचों इन्द्रिय के विषयों का भी होता है,
जैसे 1 घंटे को सिर्फ भगवान को ही देखूंगा ।

मुनि श्री सुधासागर जी

आस्तिक्य गुण का अर्थ यह नहीं है कि मात्र अपने अस्तित्व को ही स्वीकार करना,
बल्कि…
दुनिया में जितने पदार्थ हैं, उनको यथावत/ उसी रूप में स्वीकार करना ।
जो दूसरों में जीवत्व को देखता है, उसे ही आचार्यों ने आस्तिक कहा है अन्यथा वह नास्तिक है ।

आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज

दीपावली के अवसर पर घरों के बाहर ख़ूब सजावटें की गयीं,
घरों के अंदर बस एक/ दो कागज़ के फूलों की माला !
बाहर की सज़ावटों को तो घर वाले यदाकदा देखते हैं और बाहर वाले तो यदाकदा ही आते हैं । यदि हमारी सज़ावटें उनकी सज़ावटों से कम हुईं तो उनको घमंड और हमको हीनता के भावों में कारण बन जातीं हैं, उनसे अच्छी हुईं तो हमको घमंड और उनको हीन भाव ।
अतः जीवन को अंदर से सज़ाना ज़्यादा महत्वपूर्ण है ।

चिंतन

मुंबई के अतिशय(12 वर्षीय) को बड़े और मित्र अलग-अलग नाम रख-रख कर चिढ़ाते थे, उसे बहुत बुरा लगता था ।
कुछ दिन पहले वह अपनी दादी से बोला…
अब मुझे नये-नये नाम बुरे नहीं लगते, क्योंकि भगवान के भी तो 1008 नाम होते हैं । जिस दिन मेरे 1008 नाम हो जायेंगे, मैं भी भगवान बन जाउंगा ।

इसे गोबर का कीड़ा कहते हैं, ये कीड़ा सुबह उठकर गोबर की तलाश में निकलता है और दिनभर जहाँ से गोबर मिले उसका गोला बनाता रहता है।????

शाम होने तक अच्छा ख़ासा गोबर का गोला बना लेता है। फिर इस गोबर के गोले को धक्का मारते हुए अपने बिल तक ले जाता है, बिल पर पहुंचकर उसे अहसास होता है कि गोला तो बड़ा बना लिया लेकिन बिल का छेद तो छोटा है, बहुत कोशिश के बावजूद वो गोला बिल में नहीं जा सकता।
हम सब भी गोबर के कीड़े की तरह ही हो गए हैं। सारी ज़िन्दगी चोरी, मक्कारी, चालाकी, दूसरों को बेबकूफ बनाकर धन जमा करने में लगे रहते हैं, जब आखिरी वक़्त आता है तब पता चलता है के ये सब तो साथ जा ही नहीं सकता !

(डाॅ. पी.एन.जैन)

आ.श्री विद्यासागर जी बहुत बार निवेदन करने पर भी सागर नहीं आ रहे थे ।
सुधासागर जी महाराज ब्रह्मचारी अवस्था में अन्य ब्रम्हचारियों के साथ आचार्यश्री को सागर आने के लिये निवेदन करने गये ।
आचार्यश्री – यहाँ सफेद बाल वाले आते हैं और चले जाते हैं पर काले बाल वाले आते तो हैं फिर जाते नहीं ।
उस समूह के अधिकांश ब्रम्हचारी, मुनि(श्री क्षमासागर जी आदि) बन गये हैं ।

जैन-दर्शानुसार आज के दिन भगवान महावीर की आखिरी दिव्यध्वनि(प्रवचन) सुनी गयी थी,
उससे भव्य जीवों का जीवन धन्य हो गया था (आज भी हो रहा है/ आगे भी होता रहेगा)
इसीलिए आज की तेरस को धन्य-तेरस कहा जाता है ।
हम सब भी अपने जीवन को तेरह तरह के चारित्रों(5 महाव्रत, 5 समिति, 3 गुप्ति) को धारण करके धन्य बनायें ।

मुनि श्री प्रमाण सागर जी

गुरु की सुनते हैं, मानते नहीं हैं तो क्या यह मायाचारी है ?
नहीं लाचारी है । साधारण शिष्य श्रद्धालु होते हैं, अनुयायी नहीं ।
पर कम से कम लाल बत्ती पर रुको ज़रूर, हरी पर धीरे चलो/ना भी चलो, चलेगा ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

Archives

Archives
Recent Comments

April 8, 2022

August 2026
M T W T F S S
 12
3456789
10111213141516
17181920212223
24252627282930
31