शादी में हल्दी(प्राकृतिक) चढ़ते समय कपड़ों पर हल्दी लग गयी। शरीर को स्वास्थ्यवर्धक तथा एक दो धुलाई में साफ।
सामूहिक कपड़े धुलते समय रंगीन कपड़ों के रंग(अप्राकृतिक) सफेद कपड़ों पर लग गये, स्वास्थ्य को नुकसान तथा रंग छूटा ही नहीं, कपड़े बर्बाद।
चिंतन

(रेनू-नयाबाजार)
शेर ने सब जानवरों से अपना चित्र बनवाया।
जिराफ़ के चित्र में शेर की पीठ थी। अन्य जानवरों के चित्र भी दायें, बायें, आगे, पीछे के भाग को दिखा रहे थे। अलग-अलग मत, पर मन भिन्नता नहीं (सभी एक ही शेर को दर्शा रहे थे)।
सिर्फ मुर्दों में मत भिन्नता नहीं होती। मत भिन्नता तो जीवित होने का प्रमाण है।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
तीन दिन तक यदि किसी ने पानी भी ना पिया हो पर मिठाई का नाम लेते ही मुँह में पानी पानी हो जाता है।
तो वह पानी कहाँ से आया ?
पूर्व संस्कार/ रसना इंद्रिय के प्रति लोलुपता।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन- 22 अप्रैल)
कारण परमात्मा…. बीज/ संसार/ बिंदु। इसलिये संसार भी आदरणीय, यहाँ तक पेड़ादि भी क्योंकि वे मनुष्य की वंशवृद्धि में सहायक हैं। इसके लिये उदार चित्त होना आवश्यक है।
कार्य परमात्मा…. फल/ भगवान/ सिंधु।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
बोतलें भर भर कर रक्तदान करते हैं, उसमें तकलीफ महसूस नहीं करते लेकिन मच्छर अगर एक बूँद खून ले जाए तो बिलबिला जाते हैं।
कारण ?
संकल्प का ना होना।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन- 20 अप्रैल)
रोग पैदा तो होता है मन में, पनपता है शरीर में।
जिस क्षेत्र में रोग होता है, निदान भी उसी क्षेत्र में पाया जाता है।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन- 19 अप्रैल)
सुख की तासीर है सुप्तता।
सो सुख में सावधानी अत्यंत आवश्यक है।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
प्यासे को मिर्च खिला दो तो पानी तो आएगा पर कंठ में नहीं, आँखों में दिखेगा। लेकिन प्यास बुझाएगा नहीं। यह तो मृगमरीचिका से भी ज्यादा खतरनाक स्थिति है।
इसीलिए कहा है कि अज्ञान से बदतर कुज्ञान है।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 15 अप्रैल)
मनुष्य पर्याय बहुत पुरुषार्थ से मिली है।यदि हमने प्रमाद( गर्मियों में तो बिस्तर भी कहता है कि जल्दी उठ, पसीने से बिस्तर तर हो रहा है/ दुर्गंध आ रही है) और लोभवश अपना ओटीपी दे दिया तो ध्यान रखना, हमारे आसपास बहुत से हैकर्स बैठे हुए हैं जो हमारे पुण्य का बैलेंस जीरो कर सकते हैं !
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 14 अप्रैल)
जब मृत्यु निश्चित है तो डर क्यों?
- अपने कर्मों तथा कर्म-सिद्धांत पर विश्वास की कमी।
- ध्यान/ Meditation के अभ्यास की कमी (जो ध्यान में मृत्यु का साक्षात्कार नहीं करते)।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (शंका समाधान – )
प्राय: हम उन पर उपकार करते हैं जिन्होंने पहले हम पर उपकार किया हो।
- यदि सभी यही सोचेंगे तो उपकार करने की पहल कौन करेगा ! श्रृंखला शुरु कैसे होगी !!
- पूर्व उपकारी का उपकार करके तो हमने कर्जा़ चुकाया। आगे हमारा उपकार हो उसका बीजारोपण तो हुआ ही नहीं।
चिंतन
ज्ञान की प्रमाणिकता जानने का साधन ?
चारित्र।
तभी तो कहा है → बिना अभ्यास ज्ञान विष समान। चारित्र ज्ञान की भाषा है।
कुलीनता/ अकुलीनता, कुटिलता/ सरलता, पवित्रता/ अपवित्रता की पहचान भी चारित्र से ही होती है।
ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया
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