तीन मित्र रोजाना साथ-साथ जाते थे। एक दिन एक मित्र पैसे देता था दूसरे/ तीसरे दिन दूसरे। पहला मित्र कम से कम पैसे देने की कोशिश करता था, दूसरा नॉर्मल और तीसरा दया करके उसको ऊपर से टिप भी देता था।

पहले दो न उदार हैं ना ही उनका उद्धार होगा, तीसरे का होगा। ऊपर से जब भी वह रिक्शावाला मिलता था तो मुस्करा के नमस्कार भी करता था।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 27 फ़रवरी)

चार कषायों में से पहली दो क्रोध और मान प्रत्यक्ष देखने में आती हैं, तीसरी मायाचारी कभी-कभी और चौथा लोभ तो समझ ही नहीं सकते/ पकड़ना बहुत मुश्किल है। उसे तो कषाय मानते भी नहीं पर वह जब दिखाई दे जाता है तब बहुत नीचा देखना पड़ता है।

मुनि श्री निश्चल सागर जी (प्रवचन- 27 फ़रवरी)

1-2 ग्राम का बीज अंकुरित होते समय टनों टन मिट्टी को हटाने का पुरुषार्थ कर लेता है। वह अंकुर हमेशा ऊपर उठता है, हमारे पुरुषार्थ भी उन्नत होते हैं। अंकुर पौधा बनता है फिर वृक्ष बनता है, यहाँ तक की सृजन क्रिया शांत होती है लेकिन जब वृक्ष गिरता है तो बहुत शोर होता है, यह है विसर्जन की क्रिया।
जब हम शांत होते हैं तो रचनात्मक स्थिति होती है और जब हमारे जीवन में अशांति/ अकुलता/ व्याकुलता होती है तो समझिए विसर्जन हो रहा है। किसान बीज बोते समय यह नहीं देखता कि बीज उल्टा पड़ रहा है या सीधा, वह सिर्फ देखता है कि उसकी जमीन उपजाऊ है या नहीं, यदि नहीं है तो उसके लिये प्रयास करता है। पर हम गुरु से उम्मीद करते हैं कि वो बीज बोये, अपनी जमीन को नहीं सुधारते/ उपजाऊ नहीं बनाते।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन- 6 मई)

यंत्र – Material का सहारा जैसे लाउड स्पीकर।
मंत्र – अदृश्य शक्ति का सहारा लेकर कार्य सम्पादन।
तंत्र – भावात्मक शक्ति का सहारा लेकर कार्य सम्पादन।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

जो प्रिय वचन नहीं बोलता, वह गूंगा है।
ज़ुबान दो काम करती है ••• रस लेने का और बोलने का भी। ख़ुद रस लेने के साथ-साथ दूसरों को भी रस आये, ऐसा बोलना चाहिए।
गूंगा भी इशारों से अपना काम चला लेता है।
शब्दों के घाव बहुत गहरे/ दुखदाई होते हैं।
किसी के अंत समय में अगर आपके कठोर शब्द याद आ गए तो उसका अंत ख़राब हो सकता है, जीवन भर की साधना मिट्टी में मिल सकती है।
बोलते तो वही हो जो जानते हो, सुनने में वह भी आता है जो आप नहीं जानते।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन- 3 मई)

समाधान नहीं ढूंढ पाने पर वे समस्या बन जाते हैं। क्योंकि समाधान और समस्या दोनों ही एक स्थान पर रहते हैं। जन्म मरण भी प्राय एक ही स्थान पर होता है, अचानक की बात दूसरी है जैसे गर्मी के समय में दूर कहीं हिमपात हो रहा हो तो अनायास मौसम ठंडा हो जाता है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन- 3 मई)

व्यसन (चोरी भी व्यसन है, हालांकि इसे पांच पापों में गिना जाता है) त्याग में दक्ष कौन ?
सर्वथा त्यागी, यानी मुमुक्षु (मोक्ष सिर्फ चाहता नहीं, उसके लिए हमेशा त्याग करता/ त्याग करने के लिए तैयार रहता) जैसे मुनिराज।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन- 2 मई)

 

पूर्व से लेकर आयी हुई आयु को क्या हम बढ़ा सकते हैं?
नहीं, किंतु घटा जरूर सकते हैं, जैसे तिजोरी में रखा धन बढ़ नहीं सकता, पर लापरवाही बरतने से घट जरूर सकता है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन- 28 अप्रैल)

सूर्य ही एक ऐसा नक्षत्र है जिसकी सुबह और शाम की लालिमा एक सी होती है/ उन्नति और अवनति के समय समता भाव। प्रकाश और ताप देते समय भी कभी भेदभाव नहीं करता, सबको  समान रूप से देता है और बदले में कुछ पाने के भाव भी नहीं रखता।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन- 26 अप्रैल)

साँझ-सकारे/ क्षितिज पर खिलें/ रंग होली के,
उगे या ढले/ सूरज आह्लादित/ रंगत वही,
हानि लाभ में/ जीवन मरण में/ समरसता।

-कमल कान्त जैसवाल

दान को खर्चे में कभी मत डालना।
खर्चा होने पर लौटकर नहीं आता जबकि दान ब्याज सहित लौटकर आता है/ बीज रूप है।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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