सभ्यता जो सबके सामने दर्शायी जाए। जो प्राय: सभी लोग अच्छे से निभा लेते हैं।
संस्कार अकेले में पता लगते हैं। जो आपका असली व्यवहार/ चेहरा होता है। इसे चरित्र भी कहते हैं।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन- 20 फ़रवरी)

घर के मुख्य भाग हैं…
ड्राइंग रूम, बेडरूम, किचन और स्टोर रूम।
ड्राइंग रूम.. जहाँ पुरस्कार रखे जाते हैं लोगों को दिखाने के लिए। पुरानी यादें/ हमारा अतीत
बेडरूम.. सपनों का घर/ भविष्य
किचन.. धर्म और स्वास्थ्य की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण, हमारा वर्तमान। दुर्भाग्य के किचन खत्म ही होती जा रही है, 1BHK/ 2BHK की जगह अब 1BH/ 2BH के फ्लैट्स बनने लगे हैं।
स्टोर रूम.. किसी को ना दिखाने की जगह जो कबाड़-खाना बन जाता है। कोई भी वस्तु जब बहुत समय तक प्रयोग नहीं की जाती तो कबाड़ ही तो बन जाती है, यहाँ तक कि ज्ञान/ मनुष्य-भव भी।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन- 20 फ़रवरी)

आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के 25 ब्रह्मचारी जिनमें कुछ इंजीनियर, पोस्ट ग्रेजुएट, एल.एल.बी. आदि थे। उनको एक साथ दीक्षा दी गई। अगले दिन टिप्पणी आई कि “25 प्रतिभाओं ने देश के प्रति कर्तव्यों से पलायन कर दिया”।
स्पष्टीकरण दिया गया… ये प्रतिभायें यदि संसारी अवस्था में रहतीं तो अधिक से अधिक राष्ट्रपति बनतीं पर जब भी राष्ट्रपति आदि तक को दुविधा आती है तो यह प्रतिभायें ही उनका निवारण करती हैं जैसे शिक्षानीति के बारे में ISRO फॉर्मर चेयरपर्सन श्री ऐ.के. रंगन आचार्य श्री से चर्चा करने गए तो यह सोचकर कि वह कुछ धर्म की बात कहेंगे। पर आचार्य श्री ने शिक्षा की नीति कैसी हो उस पर महत्वपूर्ण सुझाव दिए, वे बहुत प्रभावित हुए और नई शिक्षा नीति के रेफरेंस में उन्होंने आचार्य श्री का सर्वप्रथम नाम लिया है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन- 15 फ़रवरी)

आचार्य श्री विद्यासागर जी से पूछा –> मनुष्य की सबसे बड़ी सेवा क्या है ?
अपनी मनुष्यता का एहसास करना।

मुनि श्री विनम्रसागर जी

कोयल आम के पेड़ के ऊपर बैठी गाते-गाते सो गयी। उसे देख एक खरगोश भी पेड़ की छाँव में सो गया। लोमड़ी आयी खरगोश को उठा ले गयी।

भूल गया था ऊँचे स्थान वाले सो सकते हैं, नीचे वालों को तो सतत जागरूक रहना होगा।
साधु कमाये तो दोष, गृहस्थ न कमाये तो दोष।

डॉ. ब्र. नीलेश भैया

बड़े/ पूज्य जैसे पिता/ गुरु अपनी खुद की चिंता/ भला करने लगें; पिता कमाये छोटे बैठे रहें, तो दोनों का विनाश।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

एक प्रसिद्ध किताब Appearance and Reality by F. H. Bradley में कहा है कि आभास ( आ = आना + भास = चमक/ मिथ्या) और सत् (Existence) में बहुत अंतर है जैसे दूर से सीप मोती लगती है, मृगमरीचिकादि।
सत् इंद्रिय प्रत्यक्ष नहीं, अनुभव प्रत्यक्ष होता है।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को सब ने स्वीकार कर लिया है। यह वैसा ही है जैसे कालिदास जिस डाल पर बैठे थे उसी को काट रहे थे। यह हमारी रियल इंटेलिजेंस को बर्बाद कर रहा है। यही हाल रहा तो कुछ दिनों में हर घर वृद्धाश्रम बन जाएगा और सेवा करेंगे रोबोट।
उपयोगिता का संबंध भी समाप्त हो गया यानी जीवत्व समाप्त हो गया जो जीव का आखिरी काम था उपकार करना, वह भी समाप्त।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन- 15 फ़रवरी)

व्यक्ति जीवित है/ होश में है, परीक्षण के लिये नुकीली चीज पैरों में चुभा कर देखते हैं।
दुःख भी ऐसे ही हैं, हमको एहसास दिलाते हैं कि हम जीवित हैं/ होश में हैं।

चिंतन

जब दु:ख जन्म में ही होता है, मरण में नहीं तो ऐसा क्यों कहा जाता है की जन्म-मरण में बहुत दु:ख होता है?

योगेंद्र

जन्म-मरण कहने में आ जाता है अन्यथा दु:ख तो जन्म में ही होता है, मरण में नहीं।
मरण के भय से जरूर सब दुखी रहते हैं।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान)

आचार्य श्री विद्यासागर जी तथा मुनि श्री सौम्य सागर जी आसपास के कमरों में थे। बरसात शुरू हो गई। सौम्य सागर जी ने अपनी खिड़कियाँ और दरवाजे बंद कर लिए। ध्यान आया तब आचार्य श्री का कमरा भी जाकर देखा, दोनों खुले हुए थे और आचार्य श्री ध्यान में थे, उनके ऊपर बौछारें आ रहीं थीं। दरवाजा खिड़की बंद की। जब आचार्य ध्यान से उठे उनसे क्षमा मांगी कि मैंने अपनी खिड़की तो बंद कर ली पर आपकी देर से की।
आचार्य श्री… जब बौछारें गिर रही थीं तब ध्यान बहुत अच्छा लग रहा था, बंद होने पर डिस्टर्ब हो गया।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन 9 फ़रवरी)

सत् अस्तित्व रूप है। सत्य हमेशा सत् हो आवश्यक नहीं।
सत्य धर्म नहीं धर्म तो अहिंसा है, सत्य उसकी रक्षा करता है।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

Archives

Archives
Recent Comments

April 8, 2022

June 2026
M T W T F S S
1234567
891011121314
15161718192021
22232425262728
2930