संयम                                     तप

  1. अशुभ की ओर जाने से रोकना ***** शुभ की ओर से भी
  2. कपूत/ बेईमानी का त्याग     *******सपूत/ ईमानदारी की कमाई का भी
  3. स्वर्ग ले जायेगा             ********** मोक्ष
  4. शुभ कर्म–बंध               ********** कर्म बंद(समाप्त)

(जब तक छोड़ नहीं सकते कम करें)

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

जो नारी (नाड़ी तथा जिस नारी ने जन्म दिया) जन्म से साथ रहीं, वे साथ छोड़ गयीं, तो हमारे जीवन में बाद में आयी नारी से कैसे आशा रखी जा सकती कि वह अंत तक साथ नहीं छोड़ेगी !

आचार्य श्री विद्यासागर जी

पूजादि, जिनवाणी (धार्मिक पुस्तक) को हाथ में लेकर करनी चाहिये।
क्योंकि –>
1. गलत नहीं पढ़ेंगे, सो अनादर नहीं होगा।
2. घमंड नहीं होगा कि मुझे पूरा याद है।
3. ज्यादा देर जिनवाणी हाथ में रहेगी तो शुभ-भाव रहेंगे।

बाहुवली शास्त्री-सांगानेर

1. सरल –> सामान्य/ अज्ञानी/ रागी गृहस्थ करता है पर दुःख का कारण।
2. कृत्रिम –> नाटक में… ज्ञानी/ समझदार करता है, सब संतुष्ट। जब तक संसार में हैं, यह धर्म में भी आगे बढ़ायेगा।
3. कुटिल –> गलत अभिप्राय के साथ जैसे Suspense सिनेमा में।

चिंतन

मर्जी उन्हीं की जिन्हें मर्ज़ होता है (वे ही ज़िद करते हैं/ अड़ियल होते हैं)।
भगवान की मर्जी ही तेरी अर्ज़ी।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

आँख खोलोगे तो मनोज्ञ/ अमनोज्ञ पदार्थ दिखेंगे ही, तब राग/ द्वेष के भाव होंगे ही। बचना है तो सिर/ आँख झुका कर रहना*।

ब्र.संजय (आचार्य श्री विद्यासागर जी)

(जैसे आचार्य श्री खुद रहते थे)

प्राय: सुनने में आता है अमुक व्यक्ति बहुत बुरा है।
सही प्रतिक्रिया –> ऐसा है ! तो उनकी बुराइयों की  लिस्ट बना कर देदें। पर उन बुराइयों के सामने एक कॉलम और बनायें उसमें अपने अंदर की बुराइयों के लिये क्रॉस अथवा टिक करें।

चिंतन

(आप ज्यादातर काॅलमों में टिक ही पायेंगे)

ईश्वरचंद विद्यासागर एक नाटक देख रहे थे। कलाकार स्टेज पर लड़की के साथ अभद्रता का अभिनय निभा रहा था।
विद्यासागर से देखा नहीं गया। उन्होंने स्टेज पर जाकर कलाकार को जूता मार दिया। कलाकार ने जूता सिर पर रख लिया और कहा –> मेरे जीवन का सबसे बड़ा इनाम है कि विद्यासागर जी ने उसे सच्चा मान लिया।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

(क्या हम संसार में ऐसा अभिनय नहीं कर सकते !)

स्कूल में एक लड़‌का बहुत शैतान था, फेल होता रहता था। उसके दादाजी को बुलाया गया। वे उसे लेकर अपनी खानदानी हवेली दिखाने ले गये। पूर्वजों का गौरव बताया। 12  वीं कक्षा में उस बच्चे के 78% नम्बर आये।

एकता – पुणे (संस्मरण)

यदि हम अपने भगवानों के गौरव को याद करें कि हम किनके वंशज हैं तो क्या हम घटिया काम कर पायेंगे !

क्या करें, रिश्तेदारी निभाने में धर्मध्यान में बहुत व्यवधान होता है !…..अंजू

मैं अकेले में आहार 1/2 घंटे में ले लेती हूँ। संघ के साथ (उनका ध्यान रखने में) 1½ घंटा लगता है। व्यवहार निभाना भी ज़रूरी है, वरना अंत समय भगवान का नाम सुनाने वाला नहीं मिलेगा।

आर्यिका श्री विज्ञानमति जी

कर्म और आत्मा में शक्तिशाली कौन ?
यदि एक व्यक्ति की शक्ति दस व्यक्तियों से ज्यादा हो और दूसरे व्यक्ति की शक्ति तो बहुत कम लेकिन निर्दयी/ आतंकी हो तो !
कर्म भी फल देते समय निर्दयी होते हैं। प्रायः हाहाकार मचा देते हैं।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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