दादा बने हो
दादागिरी न करो
दायरे में रहो
आचार्य श्री विद्यासागर जी
मन –> संस्कारानुसार काम करता है,
दिल –> रागादि से,
दिमाग –> बाहरी Information से।
मुनि श्री प्रणम्य सागर जी
डाक्टरों ने एक Experiment किया –> एक महिला के दोनों हाथ मेज पर रखवाये, बीच में Partition खड़ा कर दिया। बायें हाथ के पास एक नकली दायाँ हाथ रख दिया। थोड़ी देर तक डाक्टर नकली दांये हाथ पर Pencil फेरता रहा/ कहता रहा –> ये मेरा दायाँ हाथ है। थोड़ी देर बाद नकली हाथ पर हथौड़ा मारा तो महिला दर्द से चीख पड़ी। क्योंकि वह नकली हाथ(पर को) अपना मानने लगी थी।
(डा.एस.एम.जैन)

(Ekta- Pune)
अनुभव/ इंद्रियों पर आधारित प्रमाणिकता गलत भी हो सकती है जैसे पीलिया वाले के रंगों का अनुभव।
गुरु/ शास्त्र पर आधारित ज्ञान प्रमाणिक होता है।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
जो विषय कठिन हो, समझ में न आये; उसे जानने के प्रयास से पुरुषार्थ और ज्ञान में वृद्धि होती है।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
माताजी से प्रश्न → बड़े-बड़े लोग बड़े-बड़े दान करते हैं, हमें अनुमोदना करनी चाहिये या नहीं? (क्योंकि अधिक धन तो अधिक दोष सहित आता है)
पहले तो माताजी चुप रहीं। दुबारा पूछने पर –
माताजी → दान की क्या अनुमोदना, त्याग की अनुमोदना करो।
आर्यिका श्री विज्ञानमति जी
(सार-सार को गहलयो, थोथा देय उड़ाय)
(अंजू)
जिज्ञासा अपूर्णता से पैदा होती है या महत्वाकांक्षा बहुत हो जाने पर।
जिज्ञासायें समाप्त होने पर/ संतुष्ट होना ही समाधि है।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
कड़वी निबोली को चींटी भी नहीं काटतीं, मीठी होने पर नोचने/ खसोटने लगती हैं।
यदि आपको कोई सता रहा है/ निंदा कर रहा है तो यह प्रमाण है कि आप में गुणों की मिठास है।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
जो जिंदा को प्यार करते हैं, वही जाने के बाद उनसे प्यार कर सकते हैं जैसे भगवान को उनके जाने के बाद भी प्यार करते हैं।
(बुजुर्गों को जिंदा में इज्ज़त दी नहीं, मरने के बाद उनके फोटो पर माला चढ़ाना दिखावा है, प्यार नहीं)
यदि कोई कटु-शब्द कहे तो चिंतन करें →
1. ये शब्द मेरे ही तो हैं (कभी मैंने कहे होंगे)
2. कहने वाला मेरा ही कोई है (मित्र/ रिश्तेदार/ साधर्मी)
3. मेरे कर्म ही तो उदय में आकर मुझे फल दे रहे हैं।
बुदबुदायें → मदियम् , मदियम् , मदियम्
(मेरा है, मेरा है, मेरा ही तो है)
विद्वत विनोद शास्त्री – सांगानेर
मनस्वी (मन का स्वामी) ही तपस्वी बन सकता है।
तपस्वी, तेजस्वी और तेजस्वी ही यशस्वी बनता है।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
यदि शरीर को ज्यादा महत्व दिया तो आत्मा Neglect हो जाती है जैसे एक बेटे को ज़रूरत से ज्यादा महत्व देने पर दूसरा बेटा Neglected महसूस करने लगता है।
क्षु.श्री जिनेन्द्र वर्णी जी
“2get” and 2give” creates many problems.
So,
just double it .. “4get” and “4give” solves many problems.
(J.L.Jain)
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