मंदिरों में सोना चांदी के उपकरण Avoid करना चाहिये। इनसे चोरी की संभावना से ज्यादा महत्वपूर्ण है, भगवान की मूर्ति की अविनय।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
भूलकर भी देव, शास्त्र, गुरु के प्रति अविनय शब्द न निकल जाऐं।
क्षु. श्री जिनेंद्र वर्णी जी
(बिना मन से बोलने पर भी गलत वचन बोलने का दोष तो लगेगा ही जैसे बिना Intention के गाली के प्रयोग को समाज में भर्त्सना – चिंतन)
देखने में आता है कि पैसे वालों का ही सम्मान होता है,
क्या उससे गरीबों का अपमान नहीं होता ?
सम्मान पैसे वालों का नहीं उनके पूर्व के पुण्यों का होता है जिसके कारण उन्हें पैसा मिला/ पैसे के त्याग का होता है।
गरीबों का अपमान उनके पूर्व के पापों से होता है, जिसके कारण वे गरीब बने।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
(लेकिन हम गरीबों के अपमान में निमित्त न बनें तथा उनके छोटे से दान की बड़ी सराहना करें)
भूत में जीओगे तो अटक जाओगे।
भविष्य में भटक जाओगे।
वर्तमान में नित नया वर्तमान आयेगा।
बोर नहीं होगे, नित नया उत्साह आयेगा।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
कर्म तो बर्फ के गोले जैसे बढ़ते ही रहते हैं।
पुरुषार्थ से ही उसे छोटा/ तोड़ा जाता है।
कमलकांत
रति → झुकाव,
राग→ लगाव,
मोह → जुड़ाव।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
अपनी किस्मत तो हर व्यक्ति खुद लिखता है पर लिखते समय मदहोश रहता है सो भूल जाता है कि क्या लिखा था। इसलिये ज्योतिषियों से पढ़वाने चला जाता है। वह भूल जाता है कि ज्योतिषी भूलों को सुधार नहीं सकता, यह पावर तो लिखने वाले के हाथ में ही है।
स्वाभिमान… स्व-अपेक्षित,
अभिमान…. पर-अपेक्षित।
मुनि श्री सुधासागर जी
(निरभिमान… न स्व-अपेक्षित, ना पर अपेक्षित)
पटना के एक सप्ताह के प्रोग्राम से लौटने पर एक स्वाध्यायी ने कहा → यहाँ तो सूना कर गये (स्वाध्याय बंद हो गया था)।
जबाब → भगवान के जाने के बाद सूना हुआ था क्या ?
क्यों नहीं हुआ था ?
उनका प्रतिबिंब बना कर उनकी कमी की पूर्ति करते हैं।
आपने मेरी जगह दूसरों से स्वाध्याय क्यों नहीं किया ?
चिंतन
इंद्रधनुष चाहने वाले को, वर्षा सहन करनी होगी।
(सलौनी- सहारनपुर)
धर्म-भीरू कहना सही नहीं है, धर्म से डरा नहीं जाता।
संसार-भीरू धर्म करते हैं, यह सही है।
मुनि श्री सुधासागर जी
एक चींटी बचाने का पुण्य सोने के पहाड़ को दान देने से भी ज्यादा होता है।
आर्यिका श्री विज्ञानमती माता जी
कर्म और धर्म कभी विपरीत नहीं होते।
जैसे किये जाते हैं वैसे ही फलित होते हैं।
मुनि श्री अजितसागर जी
(इनके एक से स्वभाव हैं, इसलिये कर्म धर्ममय होने चाहिये)
चिंतन
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