“माँ” कहने पर मुँह खुल जाता है/ माँ के सामने ही मुँह खुलता है।
स्वतंत्रता संग्राम में मुँह खोलने की पहल करने वालों के नाम भी “म” से शुरू थे, महावीर सिंह, मोहन सिंह, मंगल पांडे आदि।
“पिता” कहते ही मुँह बंद हो जाता है।
माँ और पिता यही तो सिखाते हैं…मुँह कब बंद रखना और कब खोलना।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 29 जुलाई)
बादलों में जरा सी दरार पड़ जाए तो बादल फट जाते हैं, सर्वनाश कर देते हैं।
बच्चों से अपेक्षाएं/ बच्चों को सराहना की चाहत, दरार की शुरुआत है जैसे एक बार गलत बटन लगाने की शुरुआत हो गई तो अंत में एक होल बाकी रह ही जाता है जो बादल फटने के लिए पर्याप्त होता है।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 29 जुलाई)
आचरण से विश्वास पैदा होता है। विश्वास से ही जीवन चलता है, पड़ोसी धर्म निभता है, छत के नीचे विश्वास से ही बैठ पाते हैं, शरीर पर विश्वास करके ही हम चल पाएंगे।
विश्वास का खात्मा यानी आत्मा का खात्मा।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 29 जुलाई)
इस आचरण और विश्वास के भरोसे ही व्यक्ति मोक्षमार्ग पर कठिन तपस्या करते हुए मोक्ष की प्राप्ति करता है जैसे आज भगवान महावीर ने प्राप्त की।
दुर्जन, जिसको अवगुण ही दिखायी दें/ उनकी Publicity करे, गुणों पर दृष्टि ही न जाये।
महादुर्जन जो गुणों को भी अवगुण मानकर फैलाये।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
23 घंटे धर्म करें और यदि एक घंटा कुछ अधर्म हो जाए तो क्या दिक्कत ?
1 मिनट मांसाहार या किसी का मर्डर हो जाए तो क्या दिक्कत !
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 29 जुलाई)
धनतेरस के दिन सोना खरीदना या किसी गरीब के सोने का इंतजाम करना!
ताकि तुम भी चैन से सो सको।
भोजन में बाल आदि आने पर उसे निकाल कर बाहर फेंक देते हैं।
कटु वचन/घटना को ?
उसे तो सर पर बैठा लेते हैं, वह भी हमेशा-हमेशा के लिये;
जबकि गुरु तक को भी चौकी पर बैठाते हैं।
मन-वेदी पर परमात्मा को विराजमान करना चाहिये या पर-आत्मा को ?
आर्यिका श्री अर्हम्श्री माताजी
पंखा और एयर कंडीशनर को अधिक प्रयोग करने वालों के वात-दोष अधिक होता है। जिससे शरीर के किसी भी अंग में दर्द शुरू हो जाते हैं।
ये वात ही पित्त और कफ को बढ़ावा देती है। पसीना बहाने वालों के वात-दोष कम होते हैं क्योंकि पसीने के साथ वायु निकल जाती है।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 4 जुलाई)
बर्तनों को शुद्ध, राख से करते हैं।
आत्मा को गुरु/ भगवान की “चरण-रज” से।
भगवान की “चरण-रज” कैसे मिले ?
भगवान के गंधोदक से (स्नान का जल जो उनके चरणों का स्पर्श करके आता है)।
चिंतन
व्यक्तिगत नीति तुम्हारे लिए/ तुम्हारे जीवन में तो काम आ सकती है/ घरवालों पर भी काम नहीं करती। नीति तो वह जो पूर्व से चली आ रही है/ सर्वमान्य हो।
रावण को नीतिवान कहा पर उसकी व्यक्तिगत नीतियां थीं वरना सीता जी के साथ उसकी नीति क्यों नहीं काम की !
जापान एटम बम की त्रासदी को झेल कर भी खड़ा हो गया । वहाँ पर एक बहुत व्यापक नीति है… “थोड़ा है, ज्यादा की जरूरत नहीं”।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 3 जुलाई)
प्राय: लोग कहते हैं –> हम पुरुषार्थ नहीं कर सकते हैं। पर हम भूल जाते हैं कि मनुष्य गति, अच्छा कुल आदि पाने के लिये हमने कितने महान पुरुषार्थ किये होंगे!
मुनि श्री मंगलसागर जी
It’s easier to go down a hill than up,
but the view is much better at the top.
आचार्य श्री विद्यासागर जी के गुरु, आचार्य श्री ज्ञान सागर जी कहा करते थे…
ज्ञान व्यक्ति की शोभा बढ़ाता है, यदि चरित्र के साथ हो तो।
जैसे बाल शरीर की शोभा बढ़ाते हैं। निर्भीक शेर की शोभा बढ़ाते हैं, वे ही बाल शूकर के शरीर की शोभा घटा देते हैं।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 3 जुलाई)
राजस्थान में 3 साल से सूखा पड़ रहा था। आचार्य श्री विद्यासागर जी ने 1008 गायों को जैसलमेर से ट्रेन द्वारा अमरकंटक बुलवाया, जहाँ आचार्य श्री चातुर्मास कर रहे थे। आचार्य श्री ने पहाड़ी से 40 किलोमीटर उतरकर उन गायों की अगवानी की। किसानों से संकल्प-पत्र भरवा करके, उनको गायें भेंट कीं।
आचार्य श्री को हर्पीस हो गई थी। छोटा रास्ता जो रिस्की भी था, तीन-चार मुनियों के साथ 5-7 किलोमीटर पदयात्रा करते थे। एक-एक रात में इतनी करवटें बदलते थे कि शायद सालों में न बदली हों। नरकों की वेदना समझ में आ रही थी।
मुनि श्री निश्चिल सागर जी (प्रवचन – 1 जुलाई)
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