संसार तथा परमार्थ में विकास के लिये …

  • एक आदर्श होना चाहिये जैसे भगवान।
  • आदर्श को समझने के लिये गुरु का अवलम्बन ज़रूरी है।
  • उनके बताये रास्ते पर चलने के लिये आचरण चाहिये ( इसमें साधर्मीजनों की मुख्य भूमिका रहती है। वे सद्मार्ग पर चलने में सहायक तथा अकेलापन महसूस नहीं होने देते )।

मुनि श्री विनम्रसागर जी

छोटों को महत्व…
इकाई से ही दहाई आदि बड़ी-बड़ी संख्यायें बनतीं हैं।
इकाई को महत्व नहीं देंगे तो दहाई बनेगी कैसे !

मुनि श्री सुप्रभसागर जी

विचार किया !… जरा से आलस से (बिजली न जलाना/ लापरवाही से चलना) हम अपने जूतों के नीचे कितने कीड़ों की लाशों को लेकर घूम रहे हैं!
कभी जूतों को पलट कर देखा !!

ब्र. डॉ. नीलेश भैया<र/p>

क्या मृत्यु में वेदना होती है?

(एन. सी. जैन – नोयडा)

नहीं बीमारी/ Accident की वेदना हो सकती है।
पक्षियों आदि को देखें कितनी शांति से देह छोड़ते हैं।
समाधिमरण करने वाले साधु/ गृहस्थों का अंत समय देखें, भगवान का स्मरण करते हुए शांति/ आनन्द से देह त्याग करते हैं।

( गुरुवर मुनि श्री क्षमा सागर जी / सौम्य सागर जी)

कौन किसके पीछे भागता है?
घर वालों के पीछे पाप या पाप के पीछे घर वाले?
बड़े तो पाप के पीछे ही भागते हैं इसलिये पाप छोटों के पीछे भागता है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

यदि धर्म पुस्तकों पर बहुत दिनों तक दिमाग(Dimag) न लगाया जाए तो, उन पर दीमग(Demag)(दीमक) लग जाती है। दीमग(दीमक) का स्वभाव होता है कि वह बिना बुलाए घुस आती है, ऐसे ही बुराइयाँ हमारे जीवन में बिना बुलाए घुस आती हैं।
इसलिए समय-समय पर हमको अपनी कृतों पर तथा कृतियाँ(धर्म पुस्तकों) का निरीक्षण करते रहना चाहिए।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 2 सितम्बर)

चारों कषायें इंटरचेंजेबल हैं। मान की पूर्ति नहीं होती तो क्रोध आ जाता है, क्रोध से सफलता नहीं मिलती तो मायाचारी करने का लोभ आता है।
कषायों को संभालना वैसे ही है जैसे मेंढकों को तराजू पर तौलना।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – अगस्त 31)

बनता*
चुपचाप है,
टूटता
आवाज़ के साथ है।
इस संसार में
आवाज़ ही
आवाज़ है।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

* निर्माण।

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