मनुष्यों की श्रेणियाँ…

  • कंजूस – मेरा 1 रुपया खर्च न हो, दूसरे के चाहे हज़ारों।
  • संतुलित – मैं भी खर्च करूँ, दूसरे को भी करने दूँ।
  • असंतुलित – मैं ही खर्च करूँ, दूसरे को खर्च न करने दूँ।

चिंतन

जैन साधु की पहचान, पदयात्री तथा करपात्री।

  • पदयात्री – जीवनपर्यन्त पैदल चलते हैं।
  • करपात्री – जीवनपर्यन्त हाथ में भोजन करना/ बर्तनों में नहीं।

मुनि श्री अजितसागर जी

नारियल को “श्रीफल” इसके अनेक गुणों के कारण कहते हैं। अन्य फलों से इसमें एक और विशेषता होती है कि यह रस अलग से बनाता है।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

उपधि = परिग्रह।
उपाधि = बौद्धिक बीमारी, मेंटल नहीं। बुद्धि को मेन्टेन नहीं कर पा रहा, इसीलिए तो उपाधि चाहिए।
इन दोनों से जब व्यक्ति रहित हो जाता है तब समाधि कर पाता है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 16 अक्टूबर)

आचार्य श्री विद्यासागर जी कहा करते थे…
यदि अपनी आत्मा के दर्शन/ अनुभूति नहीं कर पा रहे तो दूसरों में आत्मा के दर्शन/ देखना शुरू कर दो।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 4 अक्टूबर)

शरीर को पूज्य बनाने के दो तरीके…
1) शरीर को पूरा अपना मानो। तब ऐसे काम होंगे ही नहीं कि कोई निरादर कर पाए।
2) पूरा पराया मानो। इतना सताओ कि सहन करते-करते पूज्य बन जाए जैसे साधुजन करते हैं।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 4 अक्टूबर)

वर्ण लाभ… दोनों वर्णों को लाभ जैसे दूध और पानी।
वर्ण संकर… दूध में नीबू जैसे देहाकर्षण से शादी/ गुणवत्ता को गौण करके।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

क्रोध, मानादि AC Current हैं, Shock देते हैं।
मोह DC, चिपका लेता है, जब तक पूरा न चूस ले।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

त्याग की मूर्तियों के सामने गृहस्थों का सम्मान करना कहाँ तक उचित है ?
त्यागियों के सामने त्याग का सम्मान करना तो तर्कसंगत है ही पर पुण्यात्माओं का सम्मान करना भी गलत नहीं है क्योंकि उनमें त्याग की संभावनाएं रहती हैं।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 9 नवंबर)

(सामने वाले का पुण्य भी रहता है भले ही त्याग ना किया हो और पुण्यवान आकर्षित करेगा ही।)

प्रगति/ बढ़ते हुए को अच्छा माना जाता है, सुंदर कहा जाता है पर ढलता हुआ सूरज क्यों ज्यादा सुंदर लगता है ?

योगेंद्र

आध्यात्मिक/ परिपक्व दृष्टि से संसार जब घटता है तो बहुत सुंदर लगता है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 3 अक्टूबर)

कहते हैं जिसका ध्यान करो वह मिल जाता है, अनुभव कहता है ज़रूरी नहीं।
जैसे दो मित्र एक ही ऑफिस में थे, एक सोचते हुए जाता था… कहीं दुर्घटना घटित न हो जाए और उसके प्राय: दुर्घटना होती थी। दूसरा मित्र सोचता हुआ जाता था ऑफिस में जाकर क्या काम करना है, उसके कभी दुर्घटना घटित नहीं हुई।
ध्यान और इच्छा दोनों विचार हैं पर ध्यान में विचार के साथ विश्वास होता है और इच्छा में विचार के साथ भय।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 3 अक्टूबर)

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