सांकृत्यायन जी ने लिखा है…मोक्ष घुमक्कड़ों को ही होता है।
क्योंकि उनका कोई व्यक्तिगत/ स्थायी ठिकाना नहीं होता, बहुत दिन ठहरे पानी में तो कीड़े पड़ जाते हैं।
ब्र. डॉ. निलेश भैया

(रेनू- नया बाजार मंदिर)
नॉनवेज में हिंसा का कारण बताने पर कुतर्क दिए जायेंगे। समझायें कि यह गंदा होता है क्योंकि इसमें खून, मांस, हड्डी आदि होते हैं। जबकि वनस्पति में यह सब नहीं होते हैं। इंफेक्शन होने की संभावना भी बहुत है।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
शिष्य…कौन सी आदत अच्छी, कौन सी बुरी और यह जीवन में कैसे आती हैं ?
गुरु ने कुटिया के एक तरफ औषधि के पौधे बुववाये, दूसरी ओर को खाली छोड़ दिया। कुछ दिनों बाद औषधि के पौधों को बड़ा करने में बहुत मेहनत करनी पड़ी, खाली जगह में खरपतवार अपने आप उग आई।
अच्छी आदतों/ पुण्य के लिए पुरुषार्थ करना पड़ता है। बुरी आदतें/ पाप बिना पुरुषार्थ के जैसे गुस्सा करना कोई सिखाता नहीं है।
ब्र. डॉ. निलेश भैया
क्या भगवान के ज्ञान में आधुनिक उपकरण मोबाइल आदि नहीं था?
यदि था तो उन्होंने ऐसे सुविधाजनक उपकरणों के बारे में बताया क्यों नहीं?
पिता बच्चों से उन चीज़ों को छुपा कर रखता है जिनके बुरे साइड इफेक्ट्स होते हैं, दुर्भाग्य बच्चों ने उसे ढूंढ निकाला है।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
एक गाँव में सब स्वस्थ। सम्मान करने अधिकारी आये। पर एक व्यक्ति मरियल सा दिखा।
ये कौन है ?
ये गाँव का डॉक्टर है।
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे… “स्वोपकारी ही परोपकारी” हो सकता है।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
धन का संबंध तो हमेशा परेशानी के साथ ही रहता है।
कम हो तो दिन में परेशानी, ज्यादा हो तो रात में।
(एन. सी. जैन – नोयडा)
बड़ों के प्रति नम्रता कर्तव्य है,
तो हम-उम्र के प्रति विनय की सूचक,
अनुजों के प्रति कुलीनता की द्योतक एवं सबके प्रति सुरक्षा है।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
क्या हम ऐसी जगह को छोड़ना नहीं चाहेंगे जहाँ सड़न/ बदबू आना शुरु हो रही हो?
यदि हाँ तो आत्मा मरते हुये शरीर को क्यों नहीं छोड़ेगी !
चिंतन
पाँचों पाप रोग-रूप हैं।
हिंसा, झूठ, चोरी और कुशील के तो लक्षण दिखते हैं और उनका इलाज सम्भव है, पर परिग्रह के लक्षण अंतरंग हैं। बाहर से कोई इलाज नहीं कर सकता।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
अंगदान… करुणा, अभय, औषधि (निरोग करना) दान में आयेगा।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (जिज्ञासा समाधान – 5-4-22)
1st Compartment में Reservation है (मनुष्य हो न!),
पर स्टेशन पर लेट पहुँचे(इस जीवन का अधिकतर समय तो विषय भोगों में बर्बाद ही कर दिया),
तब भी कम से कम आखिरी बोगी तो पकड़ लो, अगले स्टेशन (जन्म में) पर 1st बोगी (साधु अवस्था) में आ जाना।
चिंतन
साधना की पृष्ठभूमि…….विरक्त्ति,
आराधना की पृष्ठभूमि…अनुरक्त्ति,
शब्द अपने आप में…अभिव्यक्त्ति,
मौन…………………… व्यक्त्ति है।
गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी
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