ऊपर से तो गंदा नाला भी सुंदर दिखता है, पास आने पर दुर्गंध/ गंदा;
अंदर उतरने पर स्विमिंग पूल में भी घुटन होने लगती है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 18 जून)

परिस्थिति जो “पर” में स्थित हो। यह आपके हाथ नहीं।
लेकिन पूरा पुरुषार्थ करने तथा आशावान रहने से स्व-स्थिति बदल जाती है। तब परिस्थिति भी स्व-स्थिति बनने लगती है।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (शंका समाधान – 27.9.23 )

प्राय: व्यक्ति अपने से छोटे, बड़े तथा खराब सभी को नियंत्रित करना चाहता है लेकिन अपने को नहीं।
किसी को सुधारना है तो पहले अपने को सुधारना होगा उसके बाद खराब वालों को युक्ति से, कमजोरों को शक्ति से और बलवान को भक्ति से सुधारा जा सकता है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 18 जून)

सीमा के बाहर की उपलब्धि दुःखदायी बन जाती है।
जैसे सर्दियों में ऊँचे पहाड़ पर चढ़ते समय गर्म कपड़े।
अति सफाई के लिये बार-बार झाडू टूट कर गंदगी पैदा करती है।
सीमा से अधिक मिठाई खाना।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

मेडिकल विद्यार्थियों को शरीर रचना सिखाते समय डॉक्टर ने मुर्दे की नाक में उंगली डाली और चूसने लगा।
पहली सीख – घृणा नहीं करना। तुम सब ऐसा ही करो। सबने उंगली डाली और चूसने लगे, सबको उल्टियाँ होने लगीं।
दूसरी सीख – नज़र टिकाये रखो (वरना ऑपरेशन बिगड़ जायेगा)। तुम्हारी नज़र टिकी नहीं थी, मैंने एक नाक में उंगली डाली थी और चूसी दूसरी थी।

हर्र एक बहुत गुणवान देसी औषधि है। अलग-अलग मौसमों में अलग-अलग चीजों के साथ प्रयोग करना चाहिए जैसे…
1) वर्षा ऋतु: श्रावण और भाद्रपद माह में सेंधा नमक के साथ,
2) शरद ऋतु: आश्विन और कार्तिक माह में शक्कर/ खाँड,
3) हेमंत ऋतु: मार्गशीर्ष और पौष माह सोंठ के साथ,
4) शिशिर ऋतु: माघ और फाल्गुन माह में पीपल,
5) वसंत ऋतु: चैत्र और वैशाख माह में चाशनी,
6) ग्रीष्म ऋतु: ज्येष्ठ और आषाढ़ माह में गुड़ के साथ,
ऐसे प्रयोग करने से पित्त तथा वायु नियंत्रण में रहती हैं।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 26 जून)

Independent बनने के लिए बिटिया लोगों को कितनों की Dependency सहनी पड़ती है। कई बार तो अपमानजनक स्थिति का भी सामना करना होता है (विशेष परिस्थितियाँ अपवाद हैं)।
अर्थोपार्जन के स्थान पर परिवारोपार्जन करें तो अनेक फायदे।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 16 जून)

जो दूसरों को जिंदा न रहने दे, उसे जिंदा नहीं कह सकते/ उसे जिंदा रहने का अधिकार नहीं।
2) जो गुरु/ भगवान के सामने अकड़ा रहे (मुर्दे जैसा) उसे जिंदा कैसे कहें !

चिंतन

धर्म स्व-आश्रित ही नहीं, पर निमित्तक भी है।
साधुजन भी गृहस्थों की भोजन व्यवस्था लेते हैं।
काया के आश्रित तो साधु तथा गृहस्थ दोनों रहते हैं।
आज के समय में पुरुषार्थ भी शरीर के आश्रित है।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

ना काफ़ी (मिठास), नाही फीका, सच्ची मिठास प्राकृतिक।
काफ़ी मिठास – जलेबी में पर मायाचारी का प्रतीक,
फीका मिठास – रसगुल्ले में पर मिलावटी (पनीर + आटा),
प्राकृतिक मिठास – गन्ने का Pure, फायदेमंद।

मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी

मैं बुद्ध होने उठा, आशा ही दुःख का कारण है, सोचकर सो गया।
मुझसे वक़्त (समय) पूछा किसी ने, बुरा चल रहा है।
मैंने चाहा जख्म भर जाये, जख्म ही जख्म हो गये।
बेटी → भगवान मेरे पिता को अच्छा दामाद मिल जाये, छोटी बहन को अच्छा पति मिल गया।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

Archives

Archives

April 8, 2022

March 2026
M T W T F S S
 1
2345678
9101112131415
16171819202122
23242526272829
3031