रावण लंका में सुरक्षित था, राम से ज्यादा बलशाली सेना फिर भी राम क्यों जीते ?
क्योंकि रावण किसी की मानता नहीं था, अपने दादा/नाना तक की नहीं ।
राम ने सबकी, धोबी तक की बात मानी ।

ट्रकों के पीछे लिखा रहता है – “फिर मिलेंगे” ।
( फिर मिल कर क्या कर लोगे! )
जो जीवन/ धर्म/ गुरु मिले उसका सदुपयोग किया!

आचार्य श्री विद्यासागर जी

जो अकल की बात को अकल में बैठा ले, वह अक्लमंद।

बुद्धू को अकल की बात बताओ तो उल्टा पड़ जाता है।
तुम क्यों बता रहे हो?
क्या मुझ में अकल नहीं है?

क्या हम सब भी गुरूओं/भगवान की बातों को उल्टा नहीं ले रहे?

चिंतन

मोक्षमार्ग दो ही हैं ।
1. साधना
2. आराधना

जब तक साधना नहीं कर पा रहे हो, तब तक आराधना तो करो ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

3 प्रकार की बुद्धि—
1) सात्विक – करनी/अकरनी, पाप/पुण्य का भेद करे।
2) तामसिक – अधर्म को धर्म, अकर्त्तव्य को कर्त्तव्य माने।
3) राजसिक – (अपने मद में) सही/गलत का भेद नहीं कर पाये।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

अंध-विश्वास से शुरुवात घातक होती है।
विश्वास करने से पहले विचार/ ज्ञान/ विवेक लगायें।
अंत में तो विश्वास को अंधा होना ही पड़ता है यानि अन्य की तरफ से अंधे, तभी पूर्ण समर्पण संभव है।
यह अंध-विश्वास का सकारात्मक पहलू है।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

साधु/ व्रती सदैव याद रखें >>
दीक्षा अपने बल/भरोसे पर ली जाती है, औरों/समाज के बल पर नहीं।
व्रती को अपने व्रतों के नियंत्रण में रहना चाहिये, समाज के नियंत्रण में नहीं।
इसके लिये साधु को गृहस्थों से दूरी बना कर रखना चाहिये।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

हाइकु ….
“पाँचों* की रक्षा मुट्ठी** में,
मुट्ठी बंधी, लाखों की मानी”

आचार्य श्री विद्यासागर जी

एकता – सहयोग, समन्वय, समादर, संरक्षण से आती है ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

* 1) उँगलियाँ
2) इंद्रियां
3) परमेष्ठी
** प्रण/ शपथ लेते समय की मुद्रा।

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