धैर्य, क्षमतानुसार पुरुषार्थ करके बिना विकल्प के फल का इंतज़ार करना।
क्षमतानुसार पुरुषार्थ न करके फल का इंतज़ार करना, आलस होता है।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

आचार्य श्री विद्यासागर जी से किसी गृहस्थ ने कहा… हम तो श्रावक हैं, आपके दर्शन करते समय भी कुछ अपेक्षाएं रखते हैं। पर आपकी निरीहता हमको अपनी उपेक्षा लगती है। हमको सीख कैसे मिलेगी ?
आचार्य श्री…
जो सीख चुका है, उसे सिखाने का भाव नहीं,
अपना ध्यान ही, अपनों का ध्यान है,
सिखाने से ज्यादा, दिखाने से सीखता है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 15 मई)

अज्ञानी बच्चे हाथी के आगे-आगे चलते हैं (हाथी जो ज्ञान का प्रतीक है और अज्ञानी बच्चे मान के)। वही बच्चे पागल के पीछे-पीछे ताकि उसे पत्थर मार सकें।
इसीलिए आचार्य भगवन कहते हैं… ज्ञान वही जो गर्व रहित हो

मुनि श्री सौम्य सागर जी (आचार्य श्री अमोघवर्ष – गाथा 27 – 14 मई)

आचार्य श्री विद्यासागर जी कहा करते थे… झूठ यदि सफ़ेद हो सकता है तो सत्य को कड़वा कहने में क्या दुविधा !
पर सत्य होता है बर्फ़ जैसा, अग्नि पर रखने पर भी वह गर्म नहीं होता, वह अपना सत्यपना नहीं छोड़ता।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 12 मई)

कर्म करना ज्यादा महत्वपूर्ण या धर्म करना ?

क्या धर्म कर्म नहीं ?
क्या कर्म धर्ममय नहीं हो सकता ?
कितना, कब, क्यों और कौन सा कर्म करना, यही तो धर्म है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 15 मई)

आचार्य श्री विद्यासागर जी से प्रश्न किया कितने लोग मुनिराजों के चतुर्मास के लिए प्रयास करते हैं, पहले से घोषणा कर दी जाए तो उनके लिए सुविधाजनक होगा ?
आचार्य श्री …इतने लोग, इतने दिनों तक जो पुण्य लाभ करते हैं, उसमें व्यवधान क्यों डालना चाहते हैं ?
इसी तरह, जिन स्थानों पर मुनिराज होते हैं वहाँ बहुत सारे लोग शुद्ध भोजन बना कर चौके लगाना चाहते हैं, उसमें आप अंतराय क्यों डालना चाहते हैं ?

निर्यापक मुनि श्री सुधा सागर जी (प्रवचन – 5 मार्च ’24)

किसी की नकल करना आत्महत्या है।अपनी आत्मा की हत्या ही तो है!
हर व्यक्ति के अपने-अपने मौलिक गुण होते हैं,उनकी हत्या ही तो होगी!

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (जिज्ञासा समाधान – 19/322)

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