आचार्य श्री विद्यासागर जी से पूछा – इतनी सर्दी में आप बिना कपड़ों के कैसे सह लेते हैं ?
आचार्य श्री – गर्मियों में गर्मी जमा कर लेते हैं।
(गर्मी सहने से शरीर सर्दियों में भी सह लेता है।)

(अर्चना जैन – ग्वालियर)

सत्य की ही परीक्षा क्यों होती है ?
सत्य बोलना या सत्य बोलने का संकल्प लेने का मतलब… आपने हायर क्लास में जाने का फॉर्म भरा है, जब फॉर्म भरा है तो परीक्षा तो होगी न !
झूठ बोलते वाले ने तो फॉर्म ही नहीं भरा, उसकी परीक्षा कैसे होगी !

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 26 मई)

आचार्य श्री विद्यासागर जी के पास एक व्यक्ति को लाया गया जो सुसाइड करना चाहता था। आचार्य श्री स्वाध्याय कर रहे थे। वह व्यक्ति बैठा रहा 30 मिनट बाद आचार्य श्री ने नज़र उठाकर देखा। जब उसने अपनी व्यथा बताई, प्रश्न किया… इन 30 मिनट में तुमको कैसा लगा ? तुम्हारी अशांति शांत हुई ? उसने बोला हाँ ।
तो निष्कर्ष…मन अशांत हो तो वचन और काय को शांत रखो जैसे दलदल में फंसा आदमी जितनी काय को चलाएगा उतना डूबता जाएगा। पर हम ए.सी. शांत होने पर अशांत हो जाते हैं, पावर हाउस को जितना कोसने में पावर लगाते हैं, यदि उसे बचा लेते तो हम पावरफुल हो जाते।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 26 मई)

दुर्योधन के पास बड़ी सेना, दोनों गुरु, बड़े-बड़े गुरुजन, फिर भी हारा।
कारण ?
गुरुजनों से चाहता था।
पांडव गुरुजनों को चाहते थे।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

भगवान बनने के लिए (श्री रयणसार के अनुसार) – पहले भक्त बनो।
किसके ?
देव-शास्त्र-गुरु के,
देव/ गुरु प्रपंच रहित, शास्त्र विवाद/ विरोध रहित हैं।
भक्त कौन ?
जो देव-शास्त्र-गुरु के बताए रास्ते पर चले।

आर्यिका श्री अर्हम्श्री माताजी

ईर्ष्या की ख़ासियत – जिनसे करोगे उसकी प्रगति होगी (सामने वाला Competition में और मेहनत करता है)।
प्रेम किया तो वह अकर्मण्य हो जायेगा (जैसे प्रेम में आप उसके काम करने लगोगे)।

मुनि श्री विनम्रसागर जी

आचार्य श्री विद्यासागर जी अपने शिष्यों और भक्तों को सिंह बनाते थे, इसलिए हंटर जैसा अनुशासन रखते थे, श्वान नहीं जिसको पट्टा डालकर घुमाया जाए।
भिखारी*, व्यापारी** नहीं, पुजारी*** बनाते थे।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जीवकांड-गा.229 – 22 मई)

* हमेशा मांगने वाला।
** देने के बदले लेने की इच्छा रखने वाला।
***जो सिर्फ़ देना/ भक्ति करना जानता हो।

हमारा संसार प्रतिध्वनियों का ही है, जिसे हम प्रतिपल जी रहे हैं।
पाप कर्मों की भी प्रतिध्वनियां सताती हैं, क्रिया एक प्रतिक्रिया अनेक। यह सिद्धांत सत्कर्मों में भी लगता है तभी तो कहा.. कर्म फला अरिहंता(शुभ कर्म भगवान तक बना देते हैं)।
हम अपनी ही पाप क्रियाओं की प्रतिध्वनियां भी स्वीकार नहीं करते हैं जैसे चोर चोरी करके जब घिर जाता है तो चोरी का सामान पटक कर कहता है… यह मेरा नहीं है।
प्रतिध्वनि कम करने के लिए विशेषज्ञ उल्टे मटके लटका देते हैं यानी खाली होना सीख जाओ। पहले अनावश्यक को कम करो, साधुजन तो आवश्यक को भी कम करके गुरु बनते हैं।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 22 मई)

1947 से पहले का भारत Physically गुलाम था, पर आज का भारत दिमागी तौर पर Ethically गुलाम है।
गुणों का नीलाम होना ही गुलाम बनाता है।
आज तो हिंदी को भी रोमन लिपि में लिखा जाता है। यह जानते हुए भी कि देखने का प्रभाव 83% होता है, इसीलिए आदिनाथ भगवान ने भाषा नहीं लिपि सिखाई थी। पराधीनता का निमंत्रण-पत्र प्रमाद की मिठाई के साथ ही दिया जाता है।
फिरंगियों ने असन(भोजन), वसन(वस्त्र) और आसन का प्रलोभन देकर हमें पराधीन किया। जिसमें हम आज तक फंसे हुए हैं।
ग्वालियर के श्री अमरचंद बांठिया कोषाध्यक्ष(सिंधिया राजा) ने सेनानियों की सहायता के लिए कोष खोल दिया था और इसीलिये अंग्रेजों ने उन्हें तीन दिन तक फांसी पर लटकाए रखा था।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 1 से 15 अगस्त)

धूप में छाँव का अनुभव करते हो या छाँव में धूप का डर रहता है ! डरेगा वह नहीं जिसके जीवन में भगवान/ गुरु की छत्रछाया होगी।
जो चंवर ढुलवाने की अपेक्षा नहीं रखते, उनके ही 64 चंवर ढुलते हैं।
जो है उसको छोड़ने की तैयारी है या जो नहीं है उसको और पाने की !

कर्तापने से बचकर ही मोक्ष हो सकता है।
एक राज्य में अकाल पड़ गया और पड़ोसी राजा आक्रमण करने आ पहुँचा। राजा अपने गुरु के पास गया, अपना दु:ख बताया। पर एक और परेशानी थी…उसका सेवक आराम से सोता था !
उत्तर… तू भी सेवक बन जा। सेवक मान कर राज्य चला, कर्ता बनकर नहीं।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 21 मई)

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