विरोधी को सहन नहीं करोगे तब तक प्रगति नहीं/अंतिम मंजिल मोक्ष नहीं।
सारे महान लोगों तथा भगवानों तक ने विरोध को विनोद रूप में लिया तभी वे महान बने/भगवान बने।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 21 मई)

प्रगति में महत्त्वपूर्ण अवरोध,  पूर्व के मूढ़ता वाले विचार होते हैं। उनसे हम डिगना/छोड़ना नहीं चाहते हैं। जब तक उनकी तेरहवीं नहीं करेंगे तब तक नया जन्म नहीं हो सकता है।

(पीयूष जैन – दिल्ली)

कषाय* की कसाहट अंदर ज्यादा होती है, बाहर कम दिखती।
कषाय की सफाई कठिन है, उसके लिए साफ सुथरा स्थान रखना होगा जहाँ उसकी सम्मूर्छनों* की तरह उत्पत्ति ही ना हो।
विडंबना, हम कन्फेस भी करते साथ साथ जस्टिफाई भी करते रहते हैं।
कारगर उपाय… निरीक्षण नहीं, तो नियंत्रण नहीं
* क्रोध मान माया लोभ।
** कीड़े मकोड़े।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 21 मई)

आज के दिन को “रक्षा-दिवस” के रूप में मानना चाहिए क्योंकि आज 700 मुनिराजों के ऊपर घोर उपसर्ग को दूर करने के लिए मुनि विष्णु कुमार अपनी तपस्या को त्याग करके वात्सल्य भाव से मुनिराजों का उपसर्ग दूर करने आए थे।
हम वात्सल्य-दिवस को कैसे मनायें ?
ऑनलाइन शॉपिंग को कम करके, साधर्मीं भाइयों से सामान लेकर उनके प्रति अपना वात्सल्य दर्शायें

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 8 अगस्त)

आजकल सबसे महत्वपूर्ण और सबसे आम… वायु की समस्या है।
इसके कारण…
असमय भोजन करना।
व्यर्थ की और अधिक बातें करना।
सोने और उठने का समय निश्चित ना होना।
एसी और कूलर का प्रयोग।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 20 मई)

“जब कोई नहीं आता मेरे गुरुवर आते हैं,
मेरे दुःख के दिनों में वे बड़े काम आते हैं..”

पर हर समय तो गुरु रहते नहीं हैं ?
तब उनके उपदेश/ उनकी गाइडलाइन काम आती है।
सुख के दिनों में ?
सुख आया ही इसीलिए क्योंकि हम गुरु के बताए हुए रास्ते पर चल रहे थे।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 20 मई)

आचार्य श्री विद्यासागर जी…. उधारी 40 वर्ष पुरानी हो जाये तो खाते में से निकाल देते हैं।
शादी 40 साल तक नहीं हो तब तो ब्रह्मचर्य व्रत लेकर शादी के इरादे को समाप्त कर देना चाहिए।

मुनि श्री विनम्रसागर जी

Competition(प्रतिस्पर्द्धा) में बहुत से अज्ञात कारण हैं जैसे पूर्व के कर्म(भाग्य),
जब कि Cooperation(सहकारिता) में लाभ ही लाभ हैं…
1) ईर्ष्या से बचोगे।
ईर्ष्या करते किससे हैं ? व्यक्ति से नहीं, व्यक्ति की सफलता से क्योंकि उसके असफल होने पर हम ईर्ष्या नहीं, दया भाव रखने लगते हैं।
जिससे ईर्ष्या करेंगे क्या वह चीज़ हमको मिलेगी ! यानी हमें सफलता नहीं मिलेगी।
2) अनुभव बढ़ता जाएगा।
3) कम मेहनत में ज्यादा सफलता मिलेगी।
4) सद्भाव रहेगा।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 18 मई)

जब तक हमारे विचारों में शुद्धि, सामर्थ्य तथा एकता न हो,
शरीर के कोशिकाओं की तंदुरुस्ती, सामर्थ्य तथा एकता को बनाए रखना असम्भव है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

निंदा के साथ पूजा करना, स्वनिंदा बिना पूजा से कम महत्वपूर्ण है। स्वनिंदा से कर्मों का नाश होता है।
कहा जाता है –> परनिंदा करने वाले परिंदे बनते हैं।

आर्यिका अर्हम्श्री माताजी

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