“पर” तो संसार में भी अवांछनीय है,
ये काम हो तो सकता है “पर”।
परमार्थ में “पर” (दूसरे) पर उपयोग गया तो “मैं” से हटा।

चिंतन

पत्थर ऊपर फेंकने पर कम तेजी से जाता है। लौटता बहुत तेजी के साथ, सिर फोड़ देता है।
कर्म ऊपर जाते पत्थर हैं, कर्म-फल लौटते पत्थर/ कर्म ब्याज सहित फल देते हैं।

मुनि श्री मंगल सागर जी

कैसे पता लगे कि मेरी आत्मा जाग्रत है या नहीं ?
सुबह जगने आदि के लिये आत्मा को संबोधन करें कि मुझे इतने बजे जगा देना। यदि Respond करती है तो जाग्रत है।

चिंतन

एक हिंसा, हिंसा के लिये → महान दोष।
दूसरी हिंसा, शुभ क्रियाओं में (पूजा, मंदिर निर्माण आदि) → जघन्य दोष।
जीव दोनों में मरे, दूसरी हिंसा में मरने वाले भी सुगति में नहीं जायेंगे क्योंकि उनको एहसास ही नहीं कि वे अच्छे काम के दौरान मरे हैं।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

1. दुखी/ दीनहीन होंगे तो ध्यान आकर्षित होगा।
2. समय से पहले बड़े होने की आकांक्षा; बल/ शरीर तो बढ़ा नहीं सकते सो बौद्धिक ज्ञान बढ़ाने अचरा/ कचरा दिमाग में भर लो।
बड़ा नुकसान –> 5 साल के निर्णय 50 साल पर लागू हो कर, Bad Result दे रहे हैं।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

????आज पतंग नहीं,कर्मों को उड़ाओ।
????किसी की पतंग मत काटो,अपने कर्म काटो।
????ये कैसा मज़ा है जिसमें निरीह पक्षियों का घात हो ?
????किसी से पेच नहीं लड़ाना,अपने से लाड़ करना है।
????हार-जीत के लक्ष्य से खेल नहीं होता,भाव जुआ होता है।
????मज़ा संक्रांति में नहीं,अध्यात्म की क्रांति में है।
????चौदह जनवरी कर्म बांधने नहीं चौदह गुणस्थान पार होने को आती है।
????संक्रांति में गुड़ के नहीं,अपने अनंतगुण के लड्डू खाओ।
????तिली के लड्डू नहीं खाना बल्कि मोह को तिल तिल करके तोड़ दो।
????त्योहार तो उसे कहते हैं जिसमें आराधना का उपहार मिले।????????

(मंजू रानीवाला)

विदेश भ्रमण करके लौटते समय स्वामी विवेकानंद जी ने कहा –
अब मेरा भारत के प्रति दृष्टिकोण बदल गया है। पहले में उसका आदर करता था, अब पूजा करूँगा।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

आचार्य श्री विद्यासागर जी के पास एक व्यक्ति ने कहा –> मैं काल को नहीं मानता ॥
आचार्य श्री –> फिर घड़ी क्यों पहने हो ?
बदलाव सबमें (मन, वचन, काय) होता है/ परिवर्तन धर्म है। रागद्वेष बदलाव स्वीकार नहीं करता है पर काल स्थिर नहीं रहने देता है।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

दर्शनज्ञ सार्त्र ने कहा → “दूसरा(पर) नरक है।”
उनके शिष्य ने कहा → इससे तो हम दूसरों का अस्तित्व हीन कर रहे हैं ?
सो उसने सुधारा → “दूसरे की अनुभूति* नरक है।”
उदाहरण → एक अंधेरे कमरे में दो बहरे शांत बैठे हैं। प्रकाश होने पर ही एक दूसरे की अनुभूति हुई, मौजूद तो पहले भी थे।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

* उनमें Involvement

संसार की ऊर्जा को जीव तथा अजीव दोनों ही ग्रहण कर सकते हैं। जीव द्वारा ग्रहण तो दिखता है। अजीव में जैसे किसी स्थान में यदि नीचे हड्डियां आदि हों तो उस स्थान से नकारात्मकता प्रकट होने लगती है।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (शंका समाधान – 44)

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