कथायें आदि जानने से कल्याण नहीं होगा। जो नहीं जानते और उसे जानने का पुरुषार्थ करते हैं, उससे भला होगा। वे भव्य-सिद्ध हैं।
जैसे शुरु में Bouncer ऊपर से निकल जाते हैं, धीरे-धीरे उन्हें खेलने का अभ्यास करने वाले, अच्छे Batsman बनते हैं।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

धरती, धैर्य शब्द से बना है, धैर्य का सबसे बड़ा प्रतीक। धरती तो माँ का रूप है जो अपने बच्चों की गंदगी को साफ करती है, धरती तो उस मल को भी मूल्यवान(खाद) बनाकर वापस दे देती है।

निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी

कुंडलपुर मंदिर निर्माण के अवसर पर …
नींबू को संतरे में मिलाने से नारंगी। ऐसे ही बड़े-बड़े प्रासाद/ मंदिर बनाने में बड़े-बड़े पत्थर प्रयोग होते हैं, पर उनका संतुलन बनाये रखने में छोटी-छोटी पत्थर की Chips का भी महत्वपूर्ण योगदान रहता है। यहाँ तक कि नारंगी पर छिलका न हो तो वह सूख जाती है, यही Role स्वयंसेवकों का होता है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

अच्छे कर्म यदि बुरे भाव से किये जायें तो परिणाम शून्य।
बुरे कर्म अच्छे भाव से, तो भी शून्य।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

नियम/ व्रत/ त्याग बुद्धि (Wisdom) से लिए जाते हैं। मन तो रोकता है, व्रत आदि लेने के बाद भी मन सिर उठाता रहता है। हाँलाकि Knowledge/ शक्ति दोनों में आत्मा से ही आती है। मन बहुत Flexible होता है मजबूत से मजबूत तथा कमज़ोर से कमज़ोर भी बना सकते हैं।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

भात (भोजन) को देखभाल कर कि विषाक्त/ ज्यादा तीखा/ बदबूदार न हो, 32 बार मुँह में चबाया जाता है, तब शरीर को लाभकर होता है, वरना शरीर को स्थायी Damage.
क्या बात को 32 seconds मुंह में नहीं रख सकते !
क्या बात निकलने से पहले Check नहीं कर सकते कि ये सम्बंधों के लिये विषाक्त/ Damaging/ तीखी तो नहीं !
क्या बात में से दुर्गंध तो नहीं आ रही !!

चिंतन

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