अच्छाई के माध्यम से ही सच्चाई का दर्शन होता है।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

चीते और कुत्ते की दौड़ में, कुत्ता जी-जान से दौड़ा पर चीता दौड़ा ही नहीं।
कारण ?
चीते को अपनी Superiority सिद्ध करने की ज़रूरत ही नहीं थी।
(हम क्या सिद्ध करने में अपने जीवन को दांव पर लगा रहे हैं ?
कि हम मनुष्य हैं ?? सर्वश्रेष्ठ Category के हैं ??)

(डॉ. पी.एन.जैन)

क्या देवदर्शन टी.वी. पर करने से काम चलेगा ?

क्या पिता के जीवित रहते, उनके दर्शन फोटो पर करने से काम चलेगा?
साक्षात दर्शन के बराबर Energy मिलेगी क्या ??”
क्या यह अपशगुन नहीं माना जायेगा ???

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी)

दया/ सेवा नींव है।
Ritual इमारत, Spirituality शिखर।
बिना नींव के इमारत बनेगी नहीं, सिर्फ नींव इमारत कहलायेगी नहीं ।
बिना शिखर के धार्मिक इमारत नहीं कहलायेगी।

चिंतन

सल्लेखना के आखिरी 4 साल में शरीर को कष्ट सहिष्णु बनाना होता है, इससे सहन शक्ति बढ़ती है/ शरीर आरामतलब नहीं बनता है।
फिर रसों (मीठा/ नमकीनादि) को छोड़ते हैं। तब छाछ, तत्पश्चात जल, अंत में उसका भी त्याग कर देते हैं।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी)

पहले साधु बनने का उपदेश क्यों दिया जाता है ?
पहले मंहगा/ कीमती माल ग्राहक को दिखाया जाता है, यदि चल गया तो बड़ा फायदा (दोनों पक्षों को)।
न चल पाये तो सस्ता माल दिखाया जाता है (छोटे-छोटे नियम)।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी)

एक बार जब कोई धोखा देता है तो हमें गुस्सा आता है।
किन्तु मोह हमें जीवन-भर धोखा देता रहा उस पर हमें प्रेम क्यों आता है !!

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

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