जो सब स्वीकार कर लें/ सबको स्वीकार लें – वह प्रभु।
हम प्रभु को स्वीकार लें/ प्रभु की स्वीकार लें तो हम भी प्रभु बनने की राह पर चलने लगेंगे।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

गुटका आदि व्यसनों से भक्त को ज्यादा पाप लगता है क्योंकि उनको तो प्रशस्त-पुण्य मिला था गुरु/भगवान की सेवा करने का, उस पुण्य को उन्होंने ऐसे कामों में बर्बाद कर लिया !

मुनि श्री सुधासागर जी

डाकू से बातें कितने आदरपूर्वक, ध्यान देकर पर अरुचि से करते हैं; मित्र से रुचिपूर्वक।
संसारीयों से पूरा ध्यान, आदर पूर्वक पर अंदर से अरुचिपूर्वक, परमार्थियों से रुचिपूर्वक बातें करें/सम्बंध रखें।

चिंतन

अकाल में भी जब सब ओर पानी समाप्त हो जाता है, आँख में पानी बचा रहता है (जब तक आदमी बचा रहता है)।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

सोने से बेहतर है, गहना बनना।
पर उसमें तो अशुद्धि मिलाई जाती है ?
पर थोड़ी अशुद्धि के साथ उसकी उपयोगिता भी तो बढ़ जाती है;
वह अशुद्धि भी तप के द्वारा सोने जैसी हो जाती है।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

“प्रार्थना” से ज्यादा “आभार” प्रकट करना कारगर होता है।
प्रार्थना में नकारात्मकता/दीनता है/ अपने व्यक्तित्व को गिराना है/ अवसर कभी-कभी आते हैं, जब आप मुसीबत में फंस गये हों/ कर्म सिद्धांत पर विश्वास कम होता है/ अपने और अपनों के लिये होती है। आभार में ये सब नहीं है।

चिंतन

जिनसे मेरे कर्म कटें वे मेरे शत्रु कैसे !
जिनसे मेरे कर्म बंधे वे मेरे मित्र कैसे !!

आचार्य श्री विद्यासागर जी

संसार में अगली अगली कक्षाओं में ज्ञान तो बढ़ता जाता है पर विषय (विषय भोग) गहरे होते जाते हैं ।
धर्म में ज्ञान बढ़े या न बढ़े पर विषय हल्के होते जाते हैं।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

यथा यथा समायाति, संवित्तौ तत्त्वमुत्तमम् । तथा तथा न रोचन्ते,
विषयाः सुलभा अपि।
– इष्टोपदेश (आचार्य पूज्यपाद स्वामी)
जैसे-जैसे चेतना में उत्तम तत्वज्ञान समाविष्ट होता है, वैसे-वैसे सुलभ विषयभोग भी अरुचिकर होते जाते हैं।
(कमल कांत)

जीवन एक ऐसा सफ़र है कि मंज़िल पर पहुँचा तो मंज़िल ही बढ़ा दी – यही पतन का कारण है।
क्या करें ?
उन इच्छाओं का ध्यान करो जब पुण्य सबसे कम थे, इच्छाओं को बार-बार बदलो मत/ बढ़ाओ मत।

मुनि श्री सुधासागर जी

जीने की बात आती है तो पहले ख़ुद जीने को कहा, फिर दूसरों को (जियो और जीने दो) ।
मरने के विषय में ख़ुद को नित्य तीन बार शरीर को जलाया जाता है (ध्यान में) पर दूसरों के शरीर को चिंगारी छुलाने की कल्पना भी नहीं की जाती।

चिंतन

आज संकट(कौरोना)के समय में मंदिरों के दरवाजे क्यों बंद हैं ?
क्योंकि मंदिरों में रोने वाले उन्हें अपवित्र कर रहे थे।
ऐसे ही सूतक के समय मंदिरों में जाने/वहाँ पूजादि करने का निषेध है।
सुख में तो होटलों में जाते थे !

मुनि श्री सुधासागर जी

सूरज के उगने/अस्त होने को Sun का Birth/Death नहीं कहते बल्कि Sun-Rise/Set कहते हैं।
आत्मा के आने और जाने को Rise/Set क्यों नहीं !
उसको Birth/Death क्यों कहते हैं !!

आचार्य श्री विद्यासागर जी

(जबकि जीवन भी सूरज की तरह एक जगह अंत/set होते ही अन्य जगह पर rise हो जाता है)

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