किसान तीन टांग वाले स्टैंड पर खड़ा होकर अनाज से भूसा अलग करता है। ऐसे ही तीन पदों के हाइकू से फ़ालतू शब्द छँट जाते हैं; भाव बचा रहता है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

सब सही कहना सही नहीं। समग्रता से, दूसरे के दृष्टिकोण से देखना अनेकांत है।
गांधी जी ने कहा था, “मैं अपने दुश्मनों को भी अपना मित्र मानने लगा हूँ; क्योंकि अब मुझे दूसरों की दृष्टि से अपने को देखने की समझ आ गयी है।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

क्या इतने सालों में हम राजनीति/ धर्मादि के क्षेत्रों में पूर्वाग्रह की बेड़ियां तोड़ पाये हैं ?
अपनी मान्यताओं को मानने की मनाही नहीं है पर विपक्ष से द्वेष/घ्रणा करने की स्वतन्त्रता कैसे लेली ?

चिंतन

धर्म: स्वमुखी/आत्ममुखी, निश्चय, परमार्थ में जीना सिखाता है।

नीति: प्राणमुखी, व्यवहार, संसार में जीना सिखाती है।

मुनि श्री सुधासागर जी

किसी वस्तु पर ध्यान केंद्रित करना….

तो क्या अच्छी, बुरी किसी भी वस्तु पर ध्यान लगा सकते हैं ?

जब बच्चा होने वाला होता है, तब सुंदर और स्वस्थ बच्चे का फ़ोटो क्यों लगाते हो? बीमार और कुरूप बच्चे का लगालो!

इसीलिये ध्यान भगवान, गुरु या अपने शुद्ध आत्म स्वरूप पर लगाया जाता है, अशुद्ध चीज़ों पर नहीं; वरना अशुद्ध बनोगे।

चिंतन

पेट लैटर-बौक्स नहीं है, कि पोस्टकार्ड, लिफ़ाफ़े कुछ भी डालते रहो; जब मर्ज़ी आये तब, कितने भी डालते रहो।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

बुद्धि में तर्क होता है; पक्ष/विपक्ष, एक तरफ़ झुकाव। समझदारी निष्पक्ष होती है; अनुभव तथा विशुद्धि से आती है।

एक ज़िगज़ैग पाइप में केबॅल डालना था। बुद्धिमान लोगों की समझ में नहीं आ रहा था। एक गड़रिये ने चूहे की दुम में डोरी बाँध कर पाइप में छोड़ दिया। बस, उस डोरी से केबॅल को बाँधकर खींच लिया।

इसे कहते हैं समझदारी!

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

अवस्थाएं….
1. सुप्त – सुधबुध नहीं रहना। ज़्यादातर लोग इसी अवस्था के होते हैं।
2. स्वप्न – नयी दुनिया की रचना।
3. जाग्रत – जीवन का यथार्थ पता लग जाता है।
4. प्रबुद्ध – कल्याण के लिये प्रयत्नरत।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

अंकुर बड़े-बड़े तूफानों में भी नहीं हिलता क्योंकि जमीन से जुड़ा रहता है।
बड़े-बड़े वृक्ष छोटे-छोटे तूफानों में हिल जाते हैं/गिर जाते हैं क्योंकि वे अपने सिर जमीन से ज्यादा ऊपर उठा कर खड़े रहते हैं।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

लोभ = किसी वस्तु को पाने की तीव्र इच्छा।

चीजें भाएं, तो बुराई नहीं, पर वे चीजें लुभायें नहीं। जैसे किसी का सुंदर मोबाइल देखकर अच्छा लगे, बुरा नहीं; पर उसके प्रति मन लुभाये नहीं।

न लुभाना स्वाश्रित है।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

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