सूरज के उगने/अस्त होने को Sun का Birth/Death नहीं कहते बल्कि Sun-Rise/Set कहते हैं।
आत्मा के आने और जाने को Rise/Set क्यों नहीं !
उसको Birth/Death क्यों कहते हैं !!

आचार्य श्री विद्यासागर जी

(जबकि जीवन भी सूरज की तरह एक जगह अंत/set होते ही अन्य जगह पर rise हो जाता है)

हम बाहर की क्रियाओं को बहुत महत्त्वपूर्ण देते हैं जैसे कोयल की आवाज,
हालांकि हम यह भी नहीं जानते कि वह क्यों और क्या बोल रही है!
जब कि हमें अपनी अंतरंग भावनाओं को ज्यादा महत्त्व देना चाहिए।

चिंतन

दु:ख से ऊबकर लिया गया वैराग्य टिकता नहीं।
(क्योंकि पुण्य आकर्षित करता रहता है-गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी)

टिकाऊ वैराग्य लेना है/प्रगति करनी है तो पुण्य से ऊबो/ज्यादा कमाई से ऊबो।

मुनि श्री सुधासागर जी

राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के पायलेट को एक बड़ी नौकरी का प्रस्ताव आया, पर राष्ट्रपति से कहने की उनकी हिम्मत नहीं हो रही थी।
कलाम साहब को पता लगा तो उन्होंने कहा – “Even I want to leave Rastrapati Bhawan”. वह व्यक्ति सहज हो गया/अपराध-बोध भी समाप्त हो गया।

(सुमनलता – दिल्ली)

चलते हाथी के ऊपर मक्खी बैठी थी। थोड़ी देर बाद मक्खी ने हाथी से कहा, “यदि मेरे बैठने से चलने में वज़न ज़्यादा लग रहा हो, तो मैं उड़ कर बाकी यात्रा पूरी कर सकती हूँ।”
हर जीव अपने अस्तित्त्व को स्वीकार करवाना चाहता है। इसी कारण हम अच्छे कपड़े, ज़ेवर, आदि का प्रयोग करते हैं।

(ब्र.रेखा दीदी)

सृष्टि अधूरा देती है; पुरुषार्थ से हमको पूर्ण करने को कहती है,
जैसे…
बीज दिया, फ़सल किसान उगाये;
मिट्टी दी, घड़ा कुम्हार बनाये;
इन्द्रियां दीं, उपयोग हम पर छोड़ा।
नाई, दर्जी, सभी पसंद पूछकर आगे की क्रिया करते हैं, सृष्टि भी।

मुनि श्री सुधासागर जी

आर्यिका श्री विज्ञानमती माताजी को आहार में इडली में तोरई डालकर दी गयी, पर उन्होंने उसे ग्रहण नहीं किया।

कारण ? दोनों चीज़ें भक्ष्य थीं, फिर भी नया स्वाद तो बन गया!

अंजू – कोटा

मनुष्य जागते में भी गिर जाते हैं; पक्षी सोते में भी नहीं।
कारण ?

पक्षी अपनी मर्यादा कभी नहीं छोड़ते; जबकि मनुष्य मर्यादा तोड़ने में अपनी शान मानते हैं।

मुनि श्री प्रमाणसागर

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