बर्फ को आग भी गरम नहीं कर सकती ।
जल पी लेने से वह शरीर रूप Solid बन जाता है;
ऐसे ही हम क्रोध को पी जायें तो सामने वाले के अपशब्द हमको गरम नहीं कर पायेंगे ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

सूर्योदय लाल होता है (राग का प्रतीक)
दोपहर तपते तपते सफेद/तेजस्वी;
राग को कम/खत्म करने के लिये तप बहुत महत्वपूर्ण है ।

सूर्यास्त फ़िर लाल (ढ़लती उम्र में प्रायः राग फ़िर से उभर आता है),
सावधान !
ये लाली अंधकार में परिवर्तित हो जाती है !!

तीर्थों/गुरुओं के पास जाते हैं तो मन सुगंधि से भर जाता है, उसे घर तक कैसे बनायें रखें ?

बाग की सुगंधि का Essence बना कर घर पर ले आते हो, जब भी घर में दुर्गंध आती है तो सूंघ लेते हो,
ऐसे ही तीर्थों की विशुद्धि/ गुरुओं की शिक्षा मन में भर लाओ, ज़रूरत पर उस विशुद्धि को महसूस करो/ उपदेशों को याद कर लो।

विदेशों में तिथियाँ वहाँ के देशांतर/अक्षांशादि से निकालना चाहिये ।
पर वहां ऐसे कलैंडरादि होते नहीं हैं इसलिये वहाँ भारत की तिथि मानते हैं ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

भौंरे और गोबर के कीड़े की मित्रता हो गई, भौंरा गुबरीले से मिलने गया तो उसको गोबर खाने को दिया, दुर्गंध सहनी पड़ी ।
गुबरीला भौंरे के घर गया तो उसे फूल पर बिठा दिया, खाने को सुगंधित पराग ।
माली उसे प्रभु चरणों में पहुँचा दिया ।

लोहे पर जंग ना लगने देने का उपाय –
उपयोग
जैसे हथौड़ा/चाकू/रेलपटरी/सुई यदि उपयोग में न आयें तो उन पर जंग लग जाती है ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

कामना में इच्छा/आग्रह है, पूरी ना होने पर दल बदलते रहते हैं;
प्रार्थना में ना इच्छा है, न उसके पूर्ण होने का भाव और ना ही दलबदल;
प्रार्थना करते समय कामनायें समाप्त हो जाती हैं ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

सम्बंध बनाना जैसे मिट्टी पर मिट्टी लिखना,
सम्बंध निभाना जैसे पानी पर पानी लिखना ।
या कहें –
बनाना जैसे मिट्टी में पानी मिलाना,
निभाना जैसे मिट्टी में पानी बनाये रखना ।

थोड़े समय के लिये चीज़ों का त्याग करने से द्रव्य का आकर्षण छोड़ने का लाभ तो मिलेगा,
पर Period short होने से भावों में नियंत्रण नहीं रह पायेगा ।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

जीवन रूपी रथ के…
घोड़े – कर्म हैं,
पहिये – कर्मफल (धीरे/ तेज/ कीचड़ में धसना),
विवेक – सारथी (घोड़ों को optimum दौड़ाना पर थकाना नहीं; रथ को कीचड़ में न जाने देना ।

सुपथ पर चलोगे तो जीवन सरल, कुपथ पर हिचकोले लेगा ।

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