श्रद्धा – मेरा डॉक्टर/धर्म ठीक कर देगा,
अनुभव – मेरा डॉक्टर/धर्म ही ठीक कर पायेगा ।
यदाकदा(जब बीमारी असाध्य/पापोदय तीव्र हो) ठीक ना हो पायें तब भी श्रद्धा कम नहीं होनी चाहिये ।

महामारी की वज़ह से मंदिर बंद/ पूजादि कर नहीं पारहे हैं ।
लेकिन TV पर देखकर continue रक्खें, कहीं आदत ही न छूट जाय ।
बरसात न होने पर भी किसान सूखे में भी हल चलाते रहते हैं ताकि खुद तथा बैलों को आदत बनी रहे/ प्रमादी न हो जायें ।

मुनि श्री सुधा सागर जी

ब्रम्हचर्य >> ब्रम्ह = आत्मा + चर = आचरण/ रमण ।

1) चाम…सारहीन/ चाम पर दृष्टि से काम उत्पन्न ।
यह तन पाय महा तप कीजै, यामें सार यही है ।
2) काम…जब तक प्राप्त नहीं, आकुलता; प्राप्त होने पर, अतृप्ति; अंत में, दुःख/ पीड़ा/ पश्चाताप/ छोड़ना कठिन ।
3) राम…आत्म/आध्यात्म दृष्टि से पवित्रता/ धाम की प्राप्ति ।
4) धाम…पाने के उपाय ..
संस्कारों को महत्व;
गृहस्थों को ब्रह्मचर्याणुव्रत;
आत्मा/ परमात्मा, अशुचि(शरीर की अपवित्रा) भावना का चिंतन;
संकल्प;
लक्ष्मण रेखा का निर्धारण;
नित्य अच्छा सुनें/ पढ़ें;
नियमित खुराक न मिलने से तन सुस्त पर मन तो भ्रष्ट;
मौन रक्खें ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

त्याग के बाद त्याग के ममत्व का त्याग …आकिंचन्य धर्म है ।

झगड़ा….मेरा, तेरा, ये मेरा ये तेरा;
समाधान ..न मेरा, न तेरा, जग चिड़िया रैन बसेरा ।

जानो मेरा क्या है !
शरीर, सम्पत्ति, सम्बंधी ?
तेरे नहीं, तेरे पास हैं/ सब यहीं छूटने वाले हैं/
संयोग और स्वार्थ के हैं/ कर्माधीन हैं ।
मात्र आत्मा तेरी है, अपने स्वरूप को पहचानो/
सारी यात्रा एकाकी है ।

मालिक नहीं, संरक्षक बनो/ संभाल करो ।
रूख़े नहीं, सरस/ सजग रहो ।
अनाथ नहीं, सनाथ बनो ।
उपभोग कम, उपयोग करो ।

मुनि श्री प्रमाण सागर जी

त्याग सर्वस्य का (दान अंश का)

4 बातें …
1) कमाना ..जरूरतों/ ज़रूरतमंदों के लिए ।
न्याय और अहिंसक तरीकों से ।
जब तक स्वास्थ व परिवार-प्रेम बना रहे पर धर्म न छूटे ।
2) गंवाना..पुण्य के उदय से कमाये धन को भोगों/शान में गंवाना
3) बचाना ..अपने/ अपनों/ दया धर्म के लिए ।
4) लगाना ..60% अपने व परिवार पर, 30% भविष्य के लिए, 10% दान (कम से कम)

धन…
1) भाग्य ..धनवान घर में पैदा हुए ।
2) पुण्य ..नैतिकता से कमाया या पुण्य में लगाया ।
3) पाप ..पाप से कमाया या पाप में लगाया ।
4) अभिशप्त ..न पुण्य में लगाया, न पाप में; बस बचाया ।

मुनि श्री प्रमाण सागर जी

इच्छा निरोधः तपः

तप…
1) क्या ?.. विषयों का निरोध । आ.श्री ..अपेक्षा निरोधः तपः ।
2) क्यों ?..आध्यात्मिक उपलब्धियों के लिए, भौतिक gains के लिए नहीं ।
3) कैसा ?..बाह्य – उपवास, भूख से कम खाना, रस त्याग आदि
अंतरंग – प्रायश्चित, विनय,स्वाध्याय, ध्यान आदि ।
4) कब ?..हर समय; जब जागो तभी सवेरा ।

तपस्वी बनो ताकि मनस्वी और तेजस्वी बन सको ।

मुनि श्री प्रमाण सागर जी

संयम = सही यतन/ आत्मनियंत्रण

संयम के लिए …
1) निषेध – मन को निषेध-आज्ञा देने पर, वह पापों की ओर नहीं भागता है ।
2) नियम – Selfcommitments/ Rules निभाने से जीवन में स्थिरता/ व्यवस्था/ आनंद और शक्ति आती है ।
3) नियंत्रण – नियम के बावज़ूद भी यदि मन पापों की ओर भागे तो आत्मनियंत्रण करें ।
4) शुद्धि – अंतरंग संयम से ही जीवन में शुद्धि व सिद्धि प्राप्त होती है ।

मुनि श्री प्रमाण सागर जी

अप्रिय/ अहितकर सत्य भी असत्य है,
प्रिय/ हितकर असत्य भी सत्य है ।

1) सत्य को जानें – जो भी दिख रहा है वह सब असत्य है,
यथार्थ-दृष्टि/ परमतत्व आत्मा ही सत्य है ।
2) सत्य को भजें – सत्य की पूजा नहीं, असत्य से आसक्ति छोड़ें ।
3) सत्य जियें – सत्याचरणी बनें यानि मन,वचन और व्यवहार में सत्य उतारें ।
4) सत्य पायें – सत्य को जानकर, भजकर तथा जी कर ही; सत्य को पाया जा सकता है ।

मुनि श्री प्रमाण सागर जी

शौच = पवित्रता / लोभ का उल्टा

शौचता आती है संतोष से ।
संतोष व असंतोष में फ़र्क सिर्फ “अ” का,
“अ” = अभावोमुखी-दृष्टि ।
असंतोष के कारण …
1) अभावोमुखी-दृष्टि – जो पाता है सो भाता नहीं,जो भाता है सो पाता नहीं,इसलिए साता आती नहीं – आचार्य श्री विद्या सागर जी ।
2) यथार्थ की अनदेखी – अपनी योग्यता/ गुणों को न पहचानना ।
3) जीवन जीने का अस्वाभाविक तरीका – हैसियत से ज्यादा की इच्छा ।
4) लालसा की बहुलता – धन/ वैभव की हाय-हाय ।

सुख/ संतोष के लिए …
1) प्राप्त को पर्याप्त मानो
2) सकारात्मक-दृष्टि रक्खो
3) यथार्थ की सहज स्वीकृति
4) संयम पालन

मुनि श्री प्रमाण सागर जी

आर्जव धर्म = मायाचारी का न होना ।

4 के साथ तो छल कभी भी न करें …
1) स्वयं से – हर छल में हम अपने को तो छलते ही हैं ।
2) स्वजनों से – क्या अपना Mobile बिना Lock किये अपनों को दे सकते हो ?
3) कल्याण-मित्र से – ..देते हैं भगवान को धोखा, इंसा को क्या छोड़ेंगे..!
4) धर्म क्षेत्र में – धर्म को इस्तेमाल किया तो भव-अवांतर रसातल में ।

मुनि श्री प्रमाण सागर जी

अहंकार का न होना ही मार्दव धर्म है ।

अहंकार रूपी पर्वत से जब नदी नीचे उतरती है तभी शांति के सागर में मिलकर विराट रूप धारण कर पाती है।

अहंकार …
क्या ?…. मैं कुछ हूँ, बड़ा या छोटा ।
जन्मता ?…अज्ञान से ।
पुष्ट ?…..आत्ममुग्धता से ।
नियंत्रित ?..जीवन के सत्य को जानने से…
1) मैं अन्य प्राणियों जैसी ही आत्मा हूँ
2) मेरे पास सब संयोगों से है
3) अस्थायी है
4) कर्माश्रित है ।

मुनि श्री प्रमाण सागर जी

पर्यूषण में Rituals से Spiritual की ओर बढ़ना है;
Spiritual यानि उतार/ चढ़ाव में स्थिरता ।

क्षमा यानि धरती जैसी सहिष्णुता ।
4 स्थितियों में …
1) स्वार्थवश
2) मज़बूरी में/ परिस्थितिवश
3) भड़ास निकालने के बाद
4) अंतरआत्मा से – असली/ उत्तम ।

जब 1) से 3) में क्षमा रखते हैं तो अंतरआत्मा से क्यों नहीं !
क्रोध के संस्कार तो हैं पर कलह मत होने दें;

कलह के कारण…
1) रुचि भेद
2) आग्रह
3) ग़लतफहमी
4) स्वार्थ/अहम् –
स्वार्थ सबसे बड़ा कारण है और अहम् उसे हवा देता है ।
बदले का मज़ा तो एक दिन का, क्षमा जीवन भर की ।
बदला नहीं बदलें ।
बार-बार भावना भायें… “मुझे क्षमा रखनी है”

मुनि श्री प्रमाण सागर जी

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