भोजन का लाभ पचाने पर ही,
स्वादिष्ट/गरिष्ठ भोजन में स्वाद तो आयेगा, लाभ/शक्ति नहीं ।
स्वाध्याय के साथ भी ऐसा ही है ।

धर्म का प्रवाह बहुत महत्वपूर्ण है,
पर
यदि उपयोग नहीं किया तो वह बह जायेगा ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

भोजन दो तरह से –
पथ्य रूप = ये खाना/ये नहीं खाना,
स्वभाव रूप = स्वस्थ अवस्था में, आनंद आता है ।

इसी तरह –
धर्म औषधी रूप = दु:ख में किया गया,
आनंद रूप = सुख में किया गया, यदि आनंद-रूप करोगे तो औषधि नहीं लेना पड़ेगी ।

गृहस्थ को भी भोजन माँग कर नहीं खाना चाहिये,
ना ही परोसी हुई के अलावा माँगना चाहिये ।
अन्य कारणों के अलावा यह स्वाभिमान का भी विषय है, उज्जवल भविष्य का द्योतक है ।

मुनि श्री सुधासागर जी

कोरोना से बचने का सबसे प्रभावक उपाय है….
सबमें कोरोना देखना/मानना, उनके सम्पर्क से बचना ।
2) बुराईयों से बचने का भी यही उपाय है….
हर बुराई को चिपकने वाली मानना, उसके सम्पर्क से बचना ।
3) सामने वाले को बुरा न लगे, इससे बचने का भी यही उपाय….
यह मानना कि आपके मुंह से निकली हर बात सामने वाले के मन को चिपक जायेगी ।
दूरी बना कर रक्खें,
सावधान!

चिंतन

खून चढ़ाने से पहले ग्रुप मिलाया जाता है तभी जीवन की रक्षा होती है ।

अंतरजातीय विवाह में भी यदि संस्कार/संस्कृति मिलाली जांय तभी संस्कार/संस्कृति की रक्षा हो पायेगी ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

क्या धार्मिक क्रियायें करने से पापोदय शांत होता है ?

धार्मिक क्रियायें करने से पुण्य मिलता है, पुण्य अर्जन से पापोदय शांत होता है ।
(जैसे जलन पर शीतल लेप)

मुनि श्री सुधासागर जी

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