पर्यावरण की रक्षा की उत्कृष्ट साधना जैन संतों में दिखती है—
साधनों का कम से कम प्रयोग; अधिक से अधिक रक्षा,
यदि आहार लेते समय मुँह में बीज टूट जाये तो आहार छोड़ देते हैं/प्रायश्चित लेते हैं कि इस बीज में वृक्ष बनने की संभावना थी, वह मेरे निमित्त से समाप्त हो गयी ।

चिंतन

पत्नी का तो जीवन भर का साथ है, माँ तो थोड़े दिन की, खुश किसे रखें ?

माँ का आशीर्वाद तो जीवन भर का है, पत्नी को तो आशीर्वाद देने का ह़क ही नहीं है ।

मुनि श्री सुधासागर जी

जो अपने कल्याण में लगा हुआ है, वह दूसरों का अकल्याण कर ही नहीं सकता ।
क्योंकि दूसरे के अकल्याण के भाव आने से पहले अपना अकल्याण हो ही जायेगा ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

सुख की चाहना में कोई बुराई नहीं है, पर दु:ख की राह पर चलते हुये, सुख की चाह में विसंगति है ।
ऐसे सुख की चाहना में बुराई है जिससे औरों को दु:ख होता हो/ या जिसका अंत खुद के लिये दुखमय हो, जैसे बच्चों के द्वारा मिट्टी खाने या बड़ों के द्वारा शराब पीने की चाहना ।

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