यह परिवार के साथ ही आता है –
क्रोध की माँ है – कुमति
पत्नि – घ्रणा
बहनें – ईर्षा और चुगली
भाई – कपट
पुत्र – बैर और विरोध

समर्पित इच्छाओं को श्रद्धेय के चरनों में समर्पित करता है, ज़िद्दी इच्छाओं की पूर्ती श्रद्धेय से कराना चाहता है, अपने जीवन को रद्दी बना देता है ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

विकलेंद्रिय (2 से 4 इंद्रिय) वाले (बिना कान के कीड़े) बोलते रहते हैं, सुनते नहीं हैं ।
यदि हम भी बोलते अधिक हैं, सुनते कम या नहीं* हैं तो हममें और कीड़ों में क्या फर्क रहा !

आचार्य श्री विद्यासागर जी

*अच्छी/हितकारी/गुरू/भगवान की वाणी

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