शांतिधारा(भगवान के ऊपर जल ढालना) करते समय जल की धारा टूटने पर प्रायश्चित बहुतों ने लिया क्योंकि उसका उपयोग टूट गया था। पर गुरु के प्रवचन की धारा तोड़ने वाला आज तक कोई नहीं आया !
गर्भ में अभिमन्यु का उपयोग जब तक लगा रहा, वह चक्रव्यूह तोड़ने की कला में माहिर हो गया। उपयोग टूटने पर चक्रव्यूह से निकलने की कला ना सीख सका और धर्म की नीति का शिकार हुआ जबकि कौरवों ने धर्मनीति का शिकार किया।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 3 जुलाई)
मान भी बुरा नहीं, बस विवेक रखना है कि कहाँ पर/ अभिप्राय क्या है !
मान को प्रामाणिक बना लें।
आत्मकेंद्रित(Self oriented) बुरा नहीं, स्वार्थी(Selfish) होना बुरा है।
स्वाभिमान Broad mindedness है जबकि अभिमान Narrow mindedness, स्वयं के Ego की रक्षा करने में लगा रहता है।
ध्यान रहे कि मान की रक्षा हमें किस ओर ले जा रहा है।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 14 मई)
शील यानी स्वभाव।
जैसे ज्वलनशील (जलने वाला), सहनशील।
कमलकांत
दुर्जन कौन ?
जो दूषित भोजन करता हो। आचार्य श्री विद्यासागर जी कहा करते थे… दुर्जन को पहचानना कठिन, बचना भी कठिन। व्यक्ति दुर्जन से बचने का तो प्रयास करता है पर दूषित भोजन से नहीं। दूषित भोजन से बचना आसान है पर बचता कोई नहीं, जबकि दुर्जन के साथ यह उल्टा होता है। प्राय: लोग कहते हैं…हम दुर्जन नहीं, पर सच्चाई यह है कि दुर्जन के साथ रह-रह कर हम भूल जाते हैं कि हम भी दुर्जन हो चुके हैं।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 11 मई)
पहाड़ चढ़ते समय जितने-जितने चोटी के करीब आएंगे उतना-उतना स्पेस कम होता जाएगा/ भावनाएं बढ़ती जाएंगी। चोटी पर बने रहने के लिए संतुलन की बहुत आवश्यकता होती है।
श्रद्धा, ज्ञान और आचरण, इनकी तिपाई से स्थिरता आती है जैसे तस्वीर में प्राय: लंबाई चौड़ाई होती है। यदि उसमें गहराई आजाए तो 3D पिक्चर बन जाती है। तीसरा चरण यानी आचरण का महत्व बहुत ज्यादा है। वही उसे वास्तविकता के करीब पहुंचाता है।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 11 मई)
यदि पर की ओर देखना ही है तो “पर की आत्मा” की ओर क्यों न देखें!
ताकि आप परमात्मा बन सकें।
चिंतन
अंग्रेजों की अन्यायपूर्ण सत्ता के बारे में एक पुस्तक लिखी गई, नाम था “सोने की चिड़िया और लुटेरे अंग्रेज”। आचार्य श्री विद्यासागर जी उस पुस्तक का पूरा नाम नहीं लेते थे। अगर वह पुस्तक मंगानी होती थी तो कहते थे… सोने की चिड़िया वाली पुस्तक ले आओ।
बोलते समय इतना ध्यान रखते थे कि कठोर शब्द मुंह से न निकल जाय।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रश्नोत्तर रत्नमाला- गाथा 23 – 9 मई)
एकांत यानी एक का भी अंत।
(रेनु – नया बाज़ार)

(Ekta- Pune)
उदासीनता से न तो संसार चलता है, न ही परमार्थ।
जब इनमें उत्साह रहता है, तब दोनों उत्सव बन जाते हैं।
मुनि श्री सौरभसागर जी
आषाढ़ के माह में (जो आजकल चल रहा है) नमी बहुत होती है, त्वचा के रोमों से वायु के साथ* नमी अंदर भी चली जाती है। उससे जठराग्नि मंद पड़ जाती है।
नतीजा ! दर्द, जकड़न,वायु, किडनी संबंधित रोग। क्योंकि जठराग्नि कम होने से भोजन पचता नहीं पर हम अज्ञानतावश पूरा खाना चाहते हैं, भूख जागृत करने के लिए चाट पकोड़ी खाने लगते हैं।
नतीजा ! पेट में वायरस/ बैक्टीरिया और वायु पैदा होने लगती है। इसीलिए आयुर्वेद में कहा है… इस माह में शारीरिक परिश्रम ज्यादा जैसे मुनिराज लंबे-लंबे विहार करते हैं और व्रत उपवास करने चाहिए।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 24 जून)
* सर्दियों में तो पंखे चलते ही नहीं, गर्मियों में गर्म हवा देने लगते हैं इसलिए कम स्पीड पर चलते हैं।
साइकिल पैडल मारने पर चलती है। लेकिन ढलान पर बिना पैडल मारे भी!
क्योंकि पहले काफी पैडल मारकर अच्छी गति प्राप्त कर ली थी।
ढलान भी पूर्व के पुण्योदय से प्राप्त होती है।
पापी ने भी पूर्व में बहुत पुण्य कमाया जो आज बगैर पुण्य किए सुख भोग रहा है।
मुनि श्री विनम्रसागर जी
कहा है कि संसार को देखकर वैराग्य होता है पर हमको हो क्यों नहीं रहा ?
क्योंकि हम संसार में रूप देखते हैं जिससे राग बढ़ता है, उसका स्वरूप नहीं देखते।
वैराग्य की चिनगारी उठती तो है पर उसे लगातार ईंधन नहीं मिलता, इसलिए बुझ जाती है। सत्संग/ गुरु का सान्निध्य मिलता रहे तो वैराग्य भी बना रह सकता है।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (जीवकांड – 9 मई)
दूध जितना फटता है (दूध से दही, मक्खन, घी आदि) उतनी कीमत बढ़ती है।
हम जितना फटते हैं उतनी कीमत घटती है।
मुनि श्री विनम्रसागर जी
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