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जिसके जुड़ने / मिलने पर कार्य की सिद्धी होती है, उसे समवाय कहते हैं ।

इसके पांच अंग हैं और कार्य की सिद्धी के लिये पांचों ही आवश्यक हैं ।
1. – भव्यतव्य (क्षमता)
2. – पुरूषार्थ (महनत)
3. – उपादान (स्वभाव)
4. – निमित्त (बाह्य कारण)
5. – काललब्धि (नियति)

क्षु. श्री वर्णी जी

पुरूषार्थ और निमित्त के लिये वर्तमान में पुरूषार्थ किया जाता है,
जबकि बाकी तीन, Past के पुरूषार्थ से मिलते हैं ।

(यह वर्णी जी का चिंतन है, आगम में इसका उल्लेख नहीं मिलता – पं. रतनलाल बैनाड़ा जी)

किसी भी बड़ी से बड़ी मशीन का छोटे से छोटा पुर्ज़ा भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है, जितना बड़ा पुर्ज़ा ।
हर पुर्ज़ा अपना role पूरी efficiency से निभाता है तभी मशीन सही चल पाती है ।

इस दुनिया को चलाने में भी छोटे से छोटे आदमी का role, मशीन के छोटे पुर्ज़े की तरह ही महत्वपूर्ण है ।
यदि एक आदमी भी अपना role अपना कर्तव्य, सही नहीं अदा करेगा तो उसका असर आस-पास के सारे माहौल पर पड़ेगा ।

श्री नियाज़ अख्तर

जीवन बांसुरी जैसा है,
जिसमें बहुत से छेद (कमियाँ) हैं,
अंदर से खोखली है (सार नहीं है) ।

यदि सही छेद को, सही समय पर ऊँगली रखकर दबा दिया जाये,
तो इसी खोखलेपन से धर्म का / मोक्ष का मधुर संगीत निकलने लगता है ।

यदि विद्या पूर्ण रूप से हासिल नहीं की, तो काम नहीं चलेगा ;
जैसे अभिमन्यु अधूरी विद्या  से मारा गया ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

एक ब्रम्हचारी जी कुछ हरी सब्जियों को रख कर बाकी का त्याग कर देते थे,
और भोजन से पहले हाथ उठा कर बोलते थे  – हे बाकी सब्जियों तुम निश्चिंत रहो, तुमको अभयदान देता हूँ ।

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